Monday, 12 September, 2011

हिरामन से राजा हिन्दुस्तानी बनता गाँव का आदमी


हिरामन से राजा हिन्दुस्तानी बनता गाँव का आदमी और गाँव का असली हाल

एक बहुप्रचारित कथन है - "ग्लोबल अपने पीछे एक लोकल बना लेता है." इस बात को ध्यान से समझ लेने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैश्वीकरण की आँधी में पुराने भारतीय गाँव का बदल जाना उसकी नियति थी. इन दिनों यह कहना और सोचना आम हो गया है कि हम अपना गाँव खो रहे हैं. जिस तरह की सूचनाएँ उपलब्ध हो रही हैं उससे यह बात स्पष्ट है कि अब हम अपने गाँव को एक ऐसी इकाई में बदलते देख रहे हैं जो शहर बनने की प्रक्रिया में हैं. जितनी जल्दी उनका विकास होगा वे शहर की तरह हो जायेंगे. भारतीय संदर्भ में अब गाँव में रह रहे लोग गाँव के बारे में एक तरह से सोच रहे हैं और गाँव के जीवन की स्मृति के साथ लिखने वाले लोग दूसरी दृष्टि से. कईयों को यह लगता है कि गाँव के प्रति मोहग्रस्त लोगों के पास एक रूमानी दृष्टि है. इस रूमानी दृष्टि में चीजें किसी एक आदर्श की स्मृति के साथ रहती हैं या फिर किसी चरम स्थिति या आदर्श की ओर चीजें बढ रही होती हैं. लेखक और सिरफिरे किस्म के आदर्शवादी या संस्कृतिकर्मी ही गाँव को गाँव के रूप में बचाने की जरूरत पर ध्यान देते हैं.  इस आलेख में गाँव की स्थिति, उसकी स्मृति, उसकी असलियत और संभाव्य स्थिति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी की गयी है.
  मूल बात पर आने के पूर्व इन पंक्तियों के लेखक की अपनी दृष्टि को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर देना उचित होगा. 1920 से 1960 के बीच पश्चिम में जो एक उपभोक्ता समाज पैदा हुआ उसके लिए किसी चीज का मूल्य उसकी उपयोगिता में निहित न रहकर उसकी 'साईन वेल्यू' पर ज्यादा निर्भर है. यह एक ऐसा समाज था जो प्राक आधुनिक समाजों से गुणात्मक रूप से भिन्न था. प्राक आधुनिक समाजों में चीजों की तुलना में कुछ मूल्य अधिक महत्त्व रखते थे. बोद्रिला के शब्दों में कहें तो समाज 'सिम्बॉलिक एक्सचेंज' पर अधिक आधारित था और उत्पादन पर कम. आधुनिक समाज में उत्पादन ज्यादा महत्त्वपूर्ण बना. अब उत्तर-आधुनिक समाज में पूँजी से भी ज्यादा महत्त्व टेक्नोलॉजी का हुआ और एक तरह से किसी भी चीज की महत्ता को समाज में जिस रूप में रखा जाता है उसी से उसका महत्त्व निर्धारण होता है. ऐसे में गाँव अपने भदेस रूप में किसी भी तरह से काम्य नहीं रह गया है और इस तरह का 'सिमुलेशन' (एक तरह से मूल्य बनाने का तंत्र) गाँव और गाँव से जुडी तमाम चीजों को दोयम दर्जे का प्रचारित करने लगा है. समाज में जब तक राष्ट्रवाद जैसी आधुनिक विचारधारा का प्रभाव रहता है तब तक गाँव की एक सुंदर कल्पना बनी रहती है. जैसे जैसे राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य कमजोर होते हैं गाँव बीते जमाने को ढोने वाला स्पेस बन जाता है जिससे जितनी जल्दी मुक्ति मिले उतना ही अच्छा.
पिछले दो दशकों में भारतीय गाँवों के चरित्र में जो बदलाव आये हैं उसके कारणों और परिणामों पर विचार करने के पूर्व दो बातों का उल्लेख ज़रूरी है. प्रथम, क्या भारतीय ग्राम वैसे कभी थे जैसे राष्ट्रीय कल्पना के युग में उसे देखने की कोशिश हुई ? एक विद्वान ने ठीक ही कहा है कि ये सपने के गाँव भारत में सिर्फ सपनों में ही रहे कभी वास्तविक गाँव से इस सपने का कोई जोड नहीं बना. यह नारों में, साहित्य में, सिनेमा में और शहर में रहने वाले शहरी की कल्पना में बसा हुआ गाँव था जिसमें गाँव के किसान धरती का सीना चीरकर अपने खून पसीने से असली सोना- अनाज पैदा करते थे, पूरे समाज की चिंता करते थे, शांति से और संतोष से जीना चाहते थे. उन मेहनती किसानों को भारतीय जीवन, जीवन शैली के केन्द्र में रखकर कुछ इस तरह देखा गया कि गाँव के समाज की तमाम अंदरूनी कमजोरियाँ पार्श्व में चली गयीं. गाँव के प्रति इस रूमानी दृष्टि को हम भारत के बाहर के मुल्कों- विशेषकर रूस में भी पाते हैं जहाँ किसान जीवन को आदर्श और सच्चाई से जोडकर देखा गया. आज इस धारणा पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
दूसरी बात जिसपर सोचा जाना चाहिए कि वैश्वीकरण के दौर के तर्कों ने ग्रामीण जीवन को किस तरह प्रभावित किया. यह एक बहुप्रचारित बात है कि वैश्वीकरण ने अंतर्राष्टीय पूँजी के इस विस्तार के युग में गाँवों को बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया और देखते ही देखते गाँव का पूरा चेहरा बदल गया, उसके मूल्य बदल गये और अब स्थिति ऐसी आ गयी है कि गाँव अब शहर जैसे ही हो गये हैं. इस पूरी प्रक्रिया पर आँसू बहाना लगातार जारी है लेकिन इस परिवर्त्तन के कारणों पर विस्तार से बहस कम ही होती है.
सुविधा के लिए हम साहित्य के उदाहरण लें. गाँव और शहर के साभ्यतिक अंतर को रेखांकित करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर और गाँधी के विचारों से ही बात करना उचित होगा. यह बात सबको पता है कि गाँधी भारत को गाँवों का देश मानते थे और सारे जीवन वह गाँव और उसमें रहने वालों को ही ध्यान के केन्द्र में रखते रहे. टैगोर ने तो गाँव और शहर के बीच के अंतर को एक अनुभव के आधार पर अपने एक प्रसिद्ध निबंध में रखा है. उन्होंने लिखा है कि एक बार वे शांतिनिकेतन से कलकत्ता आ रहे थे. उनकी गाडी बीच बीच में खराब हो जाती थी और उसे फिर से चालू करने के लिए पानी की जरूरत होती थी. रास्ते में कई बार गाडी खराब हुई और हर बार आसपास के गाँवों के गरीबों ने पानी ला लाकर उन्हें मदद की. पानी लाने वाले बहुत गरीब थे और उन्हें पैसों की सख्त जरूरत होगी यह समझकर टैगोर ने उन्हें जब पैसे देने चाहे तो उन्होंने नहीं लिए क्योंकि किसी जरूरतमंद को पानी पिलाना और खाना खिलाना वे अपना धर्म समझते थे जिसके एवज में पैसे लेना उनके लिए पाप था. ऐसा ही अनुभव रास्ते में कई बार हुआ और किसी ने भी पानी देने के लिए पैसे लेना स्वीकार नहीं किया जबकि उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी. जैसे ही रवीन्द्रनाथ की मोटर कलकत्ता पहुँची और पानी की जरूरत पडी इसके लिए पैसे देने के लिए शहरी ने कहा जबकि उनके लिए पानी की व्यवस्था करना गाँव के देहातियों की तुलना में बहुत सहज था. रवीन्द्रनाथ के लिए लोगों के इस अंतर को ही सभ्यता का अंतर था. यानि, शहर का आदमी गाँव के आदमी की इस संस्कृति और धर्म-विवेक के स्थान पर मुद्रा-भित्तिक विनिमय को ज्यादा सही समझने लगा है. यह उसकी बुद्धि से आया है. गाँव और शहर के बीच के अंतर का एक हद तक रूमानी अंतर इस कथा में अंतर्निहित है. इसी तरह के कई उदाहरण साहित्य से निकाले जा सकते हैं जिसमें गाँव और शहर के बीच के इस अंतर को ध्यान में रखा गया है. कल्चरल इथॉस में यह अंतर कुछ इस तरह रच बस गया है कि लोकप्रिय सिनेमा से लेकर नाटकों तक में इस भाव को ही दुहराया गया है.
उन लेखकों को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए जिन्होंने इस तरह के एकांगी और आदर्शवादी गाँव के भीतर की जटिलता को समझने की कोशिश की. आज़ादी के बाद के हिन्दी उपन्यासों में गाँव की तस्वीर किस तरह बदली है इसके लिए फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों को देखा जा सकता है. गाँव के चित्र को मैला आँचल में कम और परती परिकथा  में अधिक फैलाव देते हुए रेणु ने जो शुरूआत की थी उसे श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी  ने रूप दे दिया. इस समय तक आते आते गाँव और शहर के बीच के अंतर में वह पुराना समीकरण- गाँव का भोला भाला व्यक्ति बनाम शहर का चालू व्यक्ति - बदल चुका था. शुक्ल के इस गाँव में आगे का कोई रास्ता नहीं बनता और जीता जागता आदमी और उसका पूरा संघर्ष का जीवन हास्यास्पद आयाम प्राप्त कर लेता है.
गाँव इस तरह बदले कि अब वहाँ संघर्ष तीव्र होने लगे और बदलाव की छटपटाहट तीखी होने लगी. इस बात पर ध्यान केन्द्रित करते हुए यह साफ दिखलायी देने लगा कि गाँव का सच वह नहीं है जो टैगोर, प्रेमचंद से लेकर सियारामशरण गुप्त तक देखने में आता था. लेकिन फिर भी गाँव के पुराने ढाँचे को पूरी तरह से 1990 के दशक के पहले नहीं तोडा जा सका. ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव में ही गाँव का चरित्र बदला. इस प्रसंग में यह चर्चा संभव नहीं कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन यह कहना प्रासंगिक होगा कि विकास की धारणा के अंतर्गत यह सामान्य नियम सा है कि गाँव को शहर की ओर जाना है, कृषि को उद्योग की ओर जाना है और धीरे धीरे मशीन केन्द्रित औद्योगिकीकरण द्वारा ही समाज की बढती जरूरतों को पूरा करना संभव है. आधुनिकीकरण मशीनीकरण का ही दूसरा नाम है. सारी दुनिया में यही मॉडल सब जगह माना गया है. इन बातों पर बगैर ज्यादा सोचे समझे ही इस देश की अर्थव्यवस्था को गुणात्मक रूप से बदल डालने वाली एक प्रक्रिया शुरू हो गयी जिसे हमसब नयी अर्थनीति से चालित वैश्वायन की प्रक्रिया कहते हैं. इसके आने के बाद बहुत ही स्वाभाविक तरीके से गाँव अब शहर की ओर तकते हुए जीने लगे. गाँव और शहर के बीच की दूरी मिटी नहीं लेकिन सपनों के बीच की दूरी मिट गयी. अब गाँव का आदमी गँवार नहीं था अब वह एक ऐसा आदमी था जिसके सपने शहरी हो रहे थे. पहले टेलिविजन, फिर केबल और बाद में मोबाईल ने उन्हें दुनिया से इस तरह 'कनैक्ट' कर दिया कि उनके सपनों में वे सपने पलने लगे जो किसी शहर के किसी गंदे कोने में जीते बस्ती में रहने वालों के दिलों में पलते थे. यह ग्रेट कल्चर और लिट्ल कल्चर के बीच के गायब होने का एक ऐसा दौर था जिसमें कोई भी यह सोच सकता था कि वह येन केन प्रकारेण बडा बन सकता है या उसे बनना चाहिए. पूरा हिन्दुस्तान मानों मिलिनियेर डॉग बनने के लिए लालायित सा दीखने लगा. कैसे भी हो गाँव को शहर की ओर जाना ही चाहिए यह मानो मंत्र सा हो गया. इस यात्रा को विकास कहा गया. हर दल इस विकास के लिए कटिबद्ध सी हो गयी.
विकास का यह तूफान अब तक नहीं थमा है. बेशुमार पैसा समाज में आया और इसने गाँव देहात के लोगों को पैसे की शक्ति से परिचित करवा दिया. कल का साधारण सा एक लडका किसी बडी कम्पनी में काम करके लाखों कमाने लगा और उस गाँव का हर बच्चा उस आदर्श जीवन के लिए जी तोड परिश्रम करने के लिए कोटा आदि जगहों में जाकर कोचिंग करने लगा. गाँव गाँव में यह खबर फैल गयी कि किसी तरह अगर 'आई आई टी' को क्रैक कर दिया जाये तो चाँदी ही चाँदी है. इस तरह के कई अन्य प्रलोभन मैनेजमेंट, मीडिया और सॉफ्टवेयर के क्षेत्रों से होता हुआ विज्ञापन की दुनिया तक फैलता गया और इस प्रक्रिया में गाँव के लोग भी जुडते गये. यह कितना दिलचस्प है कि नैनीताल, शिमला आदि स्थानों पर स्कूली शिक्षा के लिए लाखों रूपये खर्च करने वालों में सबसे बडी संख्या बिहार के छोटे शहरों के लोगों की है जो अपने बच्चे को किसी काबिल बनाने के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं.
यह बिल्कुल सही है कि नयी अर्थनीति गाँवों पर आक्रमण है. पर, इस आक्रमण के लिए खुद गाँव के लोग प्रतीक्षा में रहते हैं. एक उदाहरण देना उचित होगा. उत्तराखंड में किसी इलाके में वन सम्पदा की रक्षा के लिए सरकार ने कडे नियम बनाए ताकि जंगल बच सके. देखा गया कि वहाँ के लोगों ने ही जंगलों में आग लगाना शुरू कर दिया ताकि विकास की संभावना बन सके !
एक अन्य उदाहरण लें. बहुत सारे लोग जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हुए. उन्हें लगा कि किसानों की जमीन पर जबरन पूँजीपति लोग पैसे और शक्ति के बल पर कव्ज़ा जमा रहे हैं. लडभिड कर अंत में हुआ यह कि किसानों ने अपनी ज़मीन को ज्यादा कीमत पर बेच दिया. पता चला कि किसानों को कीमत को लेकर समस्या थी. उन्हें जब अधिक कीमत मिल गयी तो उन्हें ज़मीन बेचने में कोई दिक्कत नहीं हुई. उनकी लडाई लडने वालों में बहुतों को लगा कि उन्होंने आन्दोलन करके, दबाव बनाकर सिर्फ इतना किया कि ज़मीन की कीमत बढवा दी. ज़मीन अधिग्रहण को वे रोक नहीं पाये.
इस दौर में आयी नयी परिस्थिति में यह सोचना कि यह ट्रैंड बदलने वाला है एक खुशफहमी होगी. पैसे के लालच ने गाँव के लोगों को भी बदल दिया है. अब वे लोग स्मृति में ही रह गये हैं जो पानी को बेचना धर्म के विरूद्ध समझते हों. शहर और गाँव के बीच का साभ्यतिक अंतर जिसे रवीन्द्रनाथ ने बीसवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लक्षित किया था वह अब मिट सा गया है. इसे समझने के लिए गाँव देहात के लडके-लडकियों के मोबाईल पर हो रही बातचीत, उस मोबाईल में लोड की गयी सामग्री आदि को देखना भी पर्याप्त होगा. करोडों मोबाईल सेट आज जिस गति से गाँव देहातों में व्यवहृत हैं उसे अगर संकेतक माना जाये तो गाँव का आदमी शहर से पीछे रहने के लिए अब किसी भी रूप में तैयार नहीं दीखता. संख्या की दृष्टि से भले ही साडियाँ अब भी बहुत बिकती हैं और अभी भी पुराने गाने सुने जाते हैं, विवाह आदि में पुराने रीति रिवाज़ आज भी कायम हैं आदि आदि कहकर तसल्ली देना संभव हो लेकिन धीरे धीरे चीजें जिस ओर जा रही हैं उससे लगता नहीं कि पुराने गाँव की वापसी की कोई संभावना अब बची है.
गाँव गाँव बनता था उनमें रहने वालों के कारण. ये लोग अलग थे- अपनी सीमित आय और अपनी सीमित आकांक्षाओं के साथ ये गाँव वाले एक 'कम्यूनिटी' बनाते थे और इस कम्युनिटी की छत्रछाया में कम खा कर और ग़म खाकर रहते आये थे. अब वह कम्युनिटी धीरे धीरे खत्म होती जा रही है. आधुनिकता और अब विकास की दोहरी मार से पुराने लोग और पुराने विचार पीछे हटने लगे. यह इस रूप में काम्य था या नहीं इसपर विवेचना हो सकती है लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अब जात-पात, गाँव जवार आदि के बंधन फिर से उतने शक्तिशाली नहीं हो सकते. वे किसी किसी समय किसी विकास की चाह में लामबंद तो हो सकते हैं लेकिन इस आधारों पर सहज रूप से संघबद्ध नहीं हो सकते.
पिछले सालों में गाँव के भीतर एक दो ऐसे आन्दोलन ने उत्तर भारत में जोर पकडा था जिसने गाँव के लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति सजग और कट्टर समर्थन में खडा किया. इनमें खाप पंचायत के मामले ने कुछ दिलचस्प सवाल खडे किए. अपनी जाति/ गोत्र/ शादी के मामले में अपनी मर्जी बनाम परिवार की मर्जी आदि कई ऐसे मुद्दे बने जिसके बारे में एक भयानक सच सामने आया कि गाँव के कानून शहर के कानून से अलग है. एक साभ्यतिक अंतर भी उभरा. देश भर में इस विषय पर जो चर्चाएँ हुई उसने यह स्पष्ट कर दिया कि गाँव की ये बातें 'फंडामेंटलिज्म' को बढावा देती हैं और गाँव के लोग अपनी बहू बेटियों के साथ बर्बर व्यवहार करते हैं. एक झूठे मान की रक्षा के लिए अपनी बेटी का गला रेतने वाले ये ग्रामीण किसी भी तरह से उस आदर्श ग्राम के निवासी रूप में देखे जा सकते है? ये लोग जो स्त्री और दलितों के प्रति इतनी हेय दृष्टि रखते हैं उनके विचार क्या समाज को स्वीकार हो सकते हैं ? क्या इन दकियानूसी परम्परा को ढोते हुए आज भारतीय समाज दुनिया की तरक्की कर रही जातियों का मुकाबला कर सकती है ? इस तरह के सवाल मीडिया में बार बार उछलते रहे और यह उत्तर आता रहा कि हमारा ग्रामीण समाज सड गया है. सरकार ने जिस तरह विकास को घर घर पहुँचाने का जिम्मा लिया उसकी परिणति यह है कि आज दस- बीस गुणा अधिक पैसा खर्च करके भी गाँव को इस योग्य नहीं बनाया जा सका है कि इसमें रहने वाला यह न सोचे कि वह शहर आखिर क्यों जाये. इन पंक्तियों के लेखक को अपने जीवन में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जो अपने गाँव से संतुष्ट हो और शहर में (जिसे कई इलाकों में रोड साइड कहा जाता है) न बसना चाहता हो.
श्री लाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी  पर दुबारा लौटते हुए एक पात्र के मुँह से कहलायी गयी बात बहुत सही है कि शहर में आगे का रास्ता दिखलायी पडता है जो कि गाँव् में नहीं दिखता. रोड, बिजली, अस्पताल, शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के सारे अवसर शहरों में केन्द्रित हैं और गाँव में रहकर ठीक से खेती करना भी अब संभव नहीं रह गया है. और शहर में आने, इससे जुडने का मतलब अब वह नहीं रह गया है कि हीरामन गाँव से शहर मेले ठेले में आयेगा, बैलगाडी से धीरे धीरे चलते हुए मंदिर के पास डरते डरते गुजरेगा, भूत-प्रेत को सच मानते हुए मनौतियाँ मानेगा और किसी कुँवारी औरत को महुआ घटवारिन की कथा सुनाते हुए ले जायेगा. अब तो वह सब कुछ समझने लगा है और आकांक्षी हो गया है कि उसे वह सब कुछ क्यों नहीं मिल सकता जो किसी बडे आदमी को मिल सकता है. हीरामन अब राजा हिन्दुस्तानी का दिल रखता है. किसी भारतीय गाँव में सूरदास और होरी अब मिलें यह कठिन है और अगर मिले भी तो वे उस निर्णायक स्थिति में अब नहीं मिलेंगे जिसका उस समाज पर कोई व्यापक प्रभाव हो.
आधुनिकता की आधी अधूरी यात्रा के बीच में उत्तर आधुनिक हस्तक्षेप आने के बाद इस देश में चित्त विजय कर पूरी तरह से काबिज हो गये ग्लोबल मन के कई रजिस्टर हैं. एक में वह गाँव में रहता है, पूजा पाठ करता है तो दूसरे में काइयां बनकर हर तरह के तोल-भाव के लिए तैयार रहता है जिससे वह भी शहर के आदमी की तरह जिंदगी का मज़ा ले सके. इस देश के विभिन्न क्षेत्रों के अखबारों को उलटने से पता चल जाता है कि गाँव देहात अब कितने शहर नुमा गंदगियों से कितना भर गये हैं . विडंबना यह है कि आगे बढने का हर रास्ता इन्हीं गंदगियों से होकर गुजरता है.
विज्ञान, तकनीकी, आधुनिक शिक्षा, मीडिया, औद्योगीकरण और विस्थापन के इस दौर में सारी दुनिया में शहर तेजी से बढे हैं. इतिहासकार हॉब्सबॉम ने बीसवी शताब्दी पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए लिखा है कि इस शताब्दी के अंतिम चरण में ज्यादा लोग शहर में रहने लगे. गाँव से शहर आने के इस 'शिफ्ट' को इतिहासकार ने इस संकेतक के माध्यम से व्यक्त किया है कि एक समय किसी भी नागरिक के पहचान पत्र के रूप में राशन कार्ड को आधार बनाया जाता था लेकिन राशन कार्ड की जगह पासपोर्ट ने ले ली है.

ऐसे में कोई राह नज़र नहीं आती जिससे यह लगे कि गाँव को एक अलग तरह की जैविक इकाई मानते हुए उसके शहर में बदलते जाने की सांस्कृतिक जरूरत को लोग समझने की कोशिश करेंगे. जिस प्रकार चीन में गाँव के शहर नुमा बन जाने की प्रक्रिया में सारी दुनिया में वाहवाही हुई है उसे देखते हुए कम से कम 2011 में तो यही लगता है. अगर विश्वायन की प्रक्रिया रूकती है तब शायद लोगों को लगे कि हमारे गाँव शहर बनकर विकास नहीं करते एक सहज सामान्य जीवन शैली से उपभोक्ता समाज के अनुकूल जीवन शैली को अपनाते हैं. भारत आज भी गाँवों में अधिक बसता हो लेकिन जो रास्ता सामने दीख रहा है उससे तो यह साफ लगता है कि धीरे धीरे गाँव शहर नुमा होंगे या होने के लिए बाध्य होंगे. हाँ यह बात अलग है कि समाज में विषमता जिस तरह बढती जा रही है आपसी संघर्ष तीव्र होंगे. गाँव में हिंसा को , विषमता को समंजित करने का एक ढांचा था जिसमें गाली देने वाला तकलीफ बाँटने के लिए भी आ जाता था और सुरक्षा देने के लिए भी.  लेकिन,  ये सब चीजें खत्म होता जा रही  हैं और अब बस आदमी अकेला है- परिवार और समाज दोनों में. और असुरक्षित भी !