Sunday, 13 March, 2011

भारतीय संस्कृति का प्रश्न : एक टिप्पणी

संस्कृति का पहले जो भी अर्थ रहा हो लेकिन अभी यह अँग्रे.जी के कल्चर के अनुवाद रूप में प्रचलित है। रोचक तथ्य यह है कि अँग्रे.जी में कल्चर शब्द जर्मन शब्द कुल्टूर का अनुवाद है। इस कुल्टूर या कल्चर का एक विशेष अर्थ है। कल्चर शब्द का रवीद्रनाथ टैगोर द्वारा 'संस्कृति' के रूप अनुवाद के बाद से अधिकाकाधिक प्रचलित हुआ। रवीन्द्रनाथ के सन्दर्भ में यह बताना मुझे जरूरी लगता है, कि जब उन्हें बंगला में संस्कृति के लिए कोई शब्द नहीं मिल रहा था और जो दूसरा शब्द मिल रहा था वह था संसृति। इसके साथ उन्होंने शब्द लिया संस्कर्तृ - ये तीन शब्द उनको मिल रहे थे। इन तीन शब्दों के भावों को साथ लेकर चलने के बाद वह संस्कृति के उस अर्थ की तरफ जाते हैं, जहाँ से उन्हें कुल्टूर के उस अनुवाद को सामने रखने में मदद मिलेगी।

मेरी पहली बात है कि यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि रवीन्द्रनाथ ने कल्चर के लिए संस्कृति का प्रयोग करते समय संस्कृत, संसृति ओर संस्कर्तृ - तीनों शब्दों को आस-पास लाने के लिए इस नये शब्द का उपयोग कर रहे थे। वे एक साथ कृत्रिम, श्रेष्ठ, अनुशीलन द्वारा मांजने, प्रवाह जैसे भावों को एक शब्द में लाने की कोशिश कर रहे थे। निरन्तरता भी आये, परिष्करण भी आये और जो अन्य अर्थ संस्कर्तृ, संसृति और संस्कृत में है वह सब उसमें आ जायें। इसलिए यह बहुत व्यापक शब्द है और उसमें बहस की बहुत गुंजाइश बनती है। उस ओर न जाकर, मैं उसे वर्तमान के सन्दर्भ में लाने की कोशिश कर रहा हूँ।

संस्कृति की गत्यात्मकता ही उसकी शक्ति है। सांस्कृतिक संक्रमण के समाजशास्त्र के सन्दर्भ में, सम्यक्‌ दृष्टि हेतु यह स्मरण रखना आवश्यक है कि नीतियाँ और आदर्श परिवर्तित होते रहते हैं। नीतियाँ और आदर्श दोनों परिवर्तनशील हैं। आज के भारतीय सन्दर्भ में इस प्रश्न पर तीन स्तरों पर विचार करना उचित होगा। समाज में सांस्कृतिक परिवर्तन के दो कारण हैं - आन्तरिक दबाव एवं बाहरी दबाव। आप देख सकते हैं, भारत में एक संस्कृति के नाम पर कितना गैर सांस्कृतिक आचरण महाराष्ट्र में हो रहा है। यह उस दबाव एक बानगी मात्र समझिए। क्षेत्रीयता बहुत हद तक हमारे लिए नये प्रश्न खड़े करने जा रही है - राजनीति के सन्दर्भ में भी, संस्कृति के सन्दर्भ में भी और हमारे साहित्य के सन्दर्भ में भी ये ची.जें बहुत महत्त्वपूर्ण होने वाली है। संस्कृति के नाम पर महाराष्ट्र के इस गैर सांस्कृतिक आचरण को इसकी बानगी ही इसे मानकर चलें।

संस्कृति की आन्तरिक लड़ाइयाँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। यहाँ रामचन्द्र शुक्ल की उस बात की ओर लौटने की जरूरत है, जिसे मैं संस्कृति के विचार के सन्दर्भ में दूसरा बिन्दु मान रहा हूँ। शुक्ल जी का कहाना है कि बुद्धि की चाशनी में डुबोये बिना किसी भी भाव का स्वाद नहीं हो सकता। आज लगता है कि बा.जार की चाशनी में डुबोये बिना किसी शब्द की कोई महत्ता नहीं है, किसी बात की कोई गरिमा नहीं है, किसी विचार की कोई महत्ता नहीं है। तो यह एक नया सन्दर्भ है एक नयी बात है, जिस चुनौती के सामने हम लोगों को और तैयार होकर आना पड़ेगा और देखना पड़ेगा कि ये ची.जें इस रूप में क्यों आ रही हैं।

आप निश्चित रूप से यह मानेंगे कि इस समय एक रस्साकशी चल रही है। भारत में पूरी तरह से पूँजीवादी दौर चल रहा है । हमें समझाया जा रहा है कि पूँजीवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक ही साथ इस देश में अट्ठारवीं, उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दियां चल रही हैं। कुछ लोगों के लिए आधुनिक समय अभी नहीं आया है। कुछ लोग आधुनिक समय में चल रहे हैं और कुछ उत्तर आधुनिक होने की कोशिश कर रहे हैं जो यह समझते हैं कि उत्तर आधुनिक परिदृश्य हमारे सामने आ चुका है।

किसी-किसी माध्यम में समय खुलकर बोलता है। आज तेजी से बदलते भारतीय समाज में, विभाजित संस्कृतियों को स्पष्टतः देखा जा सकता है। पूरा भारतीय समाज मानो दो भाग में बँट गया है। एक ओर वे लोग हैं, जो वैश्र्वायन के तर्कों के साथ हैं, ग्लोबलाइजेशन के तर्कों के साथ हैं और दूसरी ओर वे हैं जो परिस्थितिवश इसके विरूद्ध हैं। भारत कभी भी एक संस्कृति का राष्ट्र नहीं रहा है। यह बात थोड़ी विवादास्पद हो सकती है। किन्तु इतिहाससम्मत यही प्रतीत होता है कि भारत की विराट संस्कृति में बहुत सारी संस्कृतियाँ बहुत संतुलित रूप में उपस्थित रही हैं, और उसी तरह उपस्थित रही हैं, जैसे एक पेड़ में बहुत सारे पत्ते एक दूसरे का स्थान न लेते हुए भी उपस्थित रहते हैं बल्कि कहें कि एक दूसरे को स्थान देते हुए उपस्थित रहते हैं। किसी का किसी से इस बात के लिए झगड़ा नहीं है कि हम हैं तो तुम नहीं हो, तुम हो तो हम नहीं हैं। इस तरह का भाव लेकर हमारी संस्कृति का विकास हुआ है। इस अर्थ में ''भारतीय संस्कृति'' का अर्थ हमारे लिए बहुत स्पष्ट है।

जिन लोगों ने इस देश की संस्कृति की आन्तरिक एकता के सूत्रों को सामने रखकर राष्ट्रीय एकता की संकल्पना तैयार की थी, उनके मूल्यों को समाज धीरे-धीरे भूल रहा है और छोड़ने की ओर बढ़ रहा है। संकट बहुत गहरे हैं। जो काम औपनिवेशिक विचारधारा नहीं कर सकी, वह काम उदारवादी वैश्र्िवक विचारधारा ने कर दिया है। इस देश के बहुसंख्यक लोग इस देश की संस्कृति के मूल्यों को स्थानीय रूपों में जिस तरह ढो रहे हैं, उसके साथ इस देश के सपने का कोई तार्किक जोड़ नहीं बनता। महान्‌ महाराष्ट्र और महान्‌ देश - इसके बीच में बहुत सारे ऐसे बिन्दु हैं, जहाँ हमें लगता है, जैसे हमारे बीच में कुछ टूट सा रहा है। कुछ ऐसा घटित हो रहा है, जिससे हमारी संस्कृति खतरे में है।

आधुनिक विचारधारा चाहे जितनी भी दमनकारी रही हो, भारतीय समाज के सामने उसने एक स्वप्न जरूर रखा था देश के नव निर्माण का, जिसमें हर भारतीय के लिए स्थान था। देश का आखिरी आदमी भी देश की प्रगति का साझेदार था। वह स्वप्न था, सच्चाई यह है कि इस देश के भीतर कई देश हैं या उन्हें बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। और बनाए जा रहे इस नए देश की एक संस्कृति नहीं है। बहुलतावादी सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विकास करते हुए देश के लोगों को आगे ले जाते हुए, प्रगति का जो स्वप्न स्वतन्त्रता के पूर्व और बाद के दशकों में देश के बुद्धिजीवियों और नेताओं ने देखा था, वह बीत चुका है, फिर कभी न लौटने के लिए। लोगों की इस प्रत्तीति के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ और इस देश की संस्कृति या संस्कृतियों का क्या होने वाला है। यही हमारे विचार का मूल बिन्दु होना चाहिए।

किसी ने कहा है कि सामाजिक प्रगति नदी के बहाव के तरह है। वह आगे की ओर ही बढ़ती है। पीछे की तरफ नहीं लौटती। गंगा इलाहाबाद से बहती हुई कलकत्ता जाकर फिर वापस नहीं लौट सकती। प्रगति को होते रहना है, उसकी यात्रा को अनवरत चलते रहना है। इसीलिए लोग कहते हैं कि प्रगति तो होगी, लेकिन प्रगति होते हुए विध्वंस कम हो, इसके लिए ही कोशिश की जा सकती है। मैं समझता हूँ इस पर दुबारा विचार करने की आवश्यकता है कि क्या प्रगति हमारे लिए इतनी ही .जरूरी चीज है कि हम सब कुछ खो दें। विकास, प्रगति इस सब मूल्यों पर फिर से बहुत सोचने की जरूरत है। ये विचार कहाँ से आये हैं, इनके मूल कहाँ से निर्धारित होते रहे हैं और अब इनमें क्या करने की .जरूरत है। जी. एच. वेल्स की बहुत विख्यात पुस्तक है 'टाइम मशीन'। उसमें प्रगति के इस तर्क का एक प्रति तर्क गढ़ा गया है और एक ऐसे सुदूर भविष्य की कल्पना की गयी है जहाँ चन्द्रमा पर निर्माण हो जाने के कारण चन्द्रमा से टूट-टूट कर टुकड़े .जमीन पर गिरते दिखाई देते हैं। यहां के लोग वहाँ और वहाँ के लोग आने लगे हैं यहाँ इस आवागमन से विध्वंस फैलने लगा है। धरती के लोग इन आगुन्तकों के भय से घाटी में लटकते हुए घरों में पक्षियों की भांति भयभीत होकर रहते हैं। वे केवल वर्तमान में रहते हैं, जैसा भी, जो भी उनके साथ हो रहा है, उसे झेलते हैं, जीते हैं और मारे भय के भविष्य के बारे में कुछ नहीं सोच पाते। वे लोग धरती पर भय से उतरते ही नहीं है। एच. जी. वेल्स दिखाते हैं कि मनुष्य भविष्य में धरती पर नहीं उतर पायेगा और घाटियो में लटका रहेगा। घर इस तरह के बनाये गये हैं जिसमें वह लटकता रह सके। और जिस दिन वह अपनी धरती पर उतरेगा, उसी दिन धरती फाड़कर बाहर के जीव-जन्तु, बाहरी ग्रह के लोग आयेंगे और उनका शिकार करके धरती के नीचे, जिसे हम पाताल कह सकते हैं, घुस जायेंगे। ये पाताल निवासी पकड़ कर लाये गए धरतीवासियों को पिंजरें में कैद कर तरह-तरह की यातनाएं देंगे। सौ साल पहले इस तरह की एक कल्पना वेल्स ने की थी। इस कल्पना के पीछे जो असली तर्क है, उसे समझने की जरूरत है कि विकास की कल्पना अन्ततः सुदूर भविष्य में हमें सुकून नहीं दे सकती। वेल्स का कहना है कि विकास के इस मार्ग पर चलकर मनुष्य पुनः उसी चक्र में लौट जायेगा, उसी जगह लौट जायंगा, जहाँ से उसने यात्रा शुरू की थी। भय, अन्धकार, पाताललोक - इस कल्पना में यही सामने आते हैं। मनुष्य पशु नहीं है। इसलिये पशु होना उस रूप में आनन्दित होते रहना ही उसका धर्म नहीं है। मनुष्य के पशु होने से उसके आगे जाने की बात संस्कृति हमें सिखाती है। संस्कृति के समाजशास्त्रीय व्याख्याकारों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि समाज के परिवर्तन के तर्कों के साथ मानवता का भविष्य सुरक्षित है या नहीं। पूरब और पश्चिम के द्वन्द्व औचित्य पर जरूरी कारणों से सवाल उठाये गये हैं। एडवर्ड सईद जैसे विद्वानों ने ''ओरियण्टलिज़्म'' लिखकर यह प्रस्तावित किया कि इस तरह के विभाजन के पीछे एक योरोपीय ज्ञानबोध है, जो पूँजी के वैश्र्िवक प्रचार के युग में सारी दुनिया में स्वीकृत करवाया गया है। हम और वे। पश्चिम और पूरब। प्रगति की सारी अवधारणा - एक ऐसे ज्ञान विमर्श - यानी नॉलेज डिसकोर्स से निकलकर आ रही है, जो पूरी तरह से पूँजी के नियन्त्रण में रही है। पूरब एक कल्पना है, जिसे पश्चिम ने अपने विरोध में उपस्थित किया। आज फिर लगता है कि पूरब और पश्चिम की सोच में उपस्थित एक मूलभूत अन्तर को रेखांकित किया जाना चाहिये। हमारे विद्वानों ने पहले ऐसा किया है। यह समझाया है कि कम से कम संस्कृति की समझ के स्तर पर यह अन्तर शायद रहा है। हमें उस तरफ लौटने की जरूरत है।

लगभग सौ बरस पहले श्रीलंका मूल के महान विद्वान केण्टिस कुमारस्वामी ने घोषणा की थी कि पश्चिम कुछ भी नया रचने में असमर्थ है। वह क्यों कह रहे हैं उनको कुछ भी नया सोचने में असमर्थ? - इन कैपबल ऑफ थिंकिंग - ये उन्हीं के शब्द हैं। इस प्रसंग में मैं रवि वर्मा प्रसंग को लाना चाहूँगा। रवि वर्मा की पेंटिंग्स को देखकर विवेकानन्द की पहली प्रतिक्रिया थी कि ये बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। और अब लगता है कि भारतीय कला बहुत आगे जा चुकी है। बाद में जब उनलोगों ने उन्हें बताया, समझाया, तो विवेकानन्द का वक्तव्य आया कि इनका कोई मूल्य नहीं है। राजा रवि वर्मा की पेंटिंग का कोई मूल्य ही नहीं है, क्योंकि यह नकल है। और यहीं पर विवेकानन्द उस भारतीय दृष्टि को पाते हैं, जहाँ उन्हें लगता है कि किसी चीज की अनुकृति मात्र में भारतीयता सुरक्षित नहीं है। वह हमारी अपनी दृष्टि नहीं है। अपनी दृष्टि की रक्षा हमें ही करनी पड़ेगी। और इस रक्षा के लिए जरूरत है हमें विवेकानन्द, अवनीन्द्रनाथ टैगोर, कुमारस्वामी से लेकर मतिराम जैसे विद्वानों की। इन विद्वानों ने पूरब और पश्चिम के इस विभेद को संस्कृति के स्तर पर समझने की कोशिश की है, उसको सामने रखा है।


साहित्य के क्षेत्र में निर्मल वर्मा का स्मरण बहुत जरूरी लगता है और संस्कृति के व्यापक सन्दर्भों को अगर हम ध्यान में रखें, तो जिस आदमी का हमें सबसे अधिक ऋणी होना चाहिए, वह हैं महात्मा गांधी। मेरी दृष्टि में महात्मा गांधी को इस समय संस्कृति पुरुष के रूप में उपस्थित किये जाने की अधिक जरूरत है, राजनीतिक पुरुष की तुलना में। अगर समाज को निर्बन्ध विकास करने दिया जाय, तो समाज जिस ओर बढ़ेगा, वह मनुष्यता का रास्ता नहीं है, वह पशुता का रास्ता है। मैं इस बात पर .जोर देना चाहता हूँ।

संस्कृति के विमर्श की जो भी व्याख्या हो, यह समाज को मनुष्यता की राह पर ले जाता है। विकास और संस्कृति की राह अलग-अलग है। एक बड़ी हद तक अलग-अलग रास्ता है इनका। इसका कार्य मानव-समाज को और कल्याणकारी बनाना है। विकास और कल्याण के बीच के गुणात्मक अन्तर को हमें समझने की जरूरत है। भारत में संस्कृति का अर्थ क्या है और यह पश्चिम की संस्कृति के अर्थ से किस प्रकार भिन्न है। भारतीय और पश्चिमी संस्कृतियों के बीच के गुणात्मक अन्तर को सामने रखते हुए एक विद्वान ने कहा था कि अब समय आ गया है कि हम चेतें और हाथ उठाकर पश्चिमी सभ्यता के ठेकेदारों से कह दें कि अब हमें आपकी सभ्यता और संस्कृति की आवश्यकता नहीं है। टी. एच. इलिएट के खोखलों मानव को उद्धृत करते हुए वह दूर तक जाते हैं और पश्चिमी संस्कृति में प्रभावी व्यक्तिवादी वेदनावाद, जिसे अस्तित्ववाद के रूप में भी हमलोग चिह्नित कर सकते हैं, को भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा के विरोध में बतालते हैं। इस दृष्टि से पश्चिमी संस्कृति के साथ भारतीय संस्कृति का मेल शराब और दूध के मेल जैसा है। वे जानते थे कि भारतीय संस्कृति की समझ पश्चिमी संस्कृति की समझ से अलग है। संस्कृति बहुत व्यापक शब्द है। ऐसा माना जाना चाहिए कि संस्कृति में जितने अर्थ हैं वह कल्चर में शायद नहीं हैं। संस्कृति बहुत ही व्यापक शब्द है। पश्चिम की संस्कृति के विमर्श में जीवन का एक कोलाहल है। जहाँ-जहाँ पश्चिम का विस्तार होगा, जहाँ-जहाँ पश्चिम का प्रभाव ज्य़ादा होगा, वहाँ जीवन में कोलाहल अधिक प्रबल होता जायेगा। यह बात उनके भाषण में आयी है। यह कोलाहल संक्रमण काल की एक महत्त्वपूर्ण चीज है। पुराने सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण होता है और नये मूल्य प्रचारित होते हैं। संस्कृति के समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए अब भारत में यह जरूरी है कि संक्रमण के पीछे चल रहे सामाजिक संघर्षों के साथ इन मूल्यों का सम्पर्क स्थापित करें। ऐसा क्यों हो रहा है कि एक देश के भीतर कई संस्कृतियाँ दिखलायी जा रही हैं। आपस में मारकाट बढ़ने लगी है और जिसे हम विध्वंस की राजनीति कहते हैं कि वह अपने साथ विध्वंस की संस्कृति भी लेकर चल रही है। ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर सबसे अधिक विचार करना चाहिये।

अब मैं वर्तमान सन्दर्भों की ओर आना चाहूँगा। इस देश की संस्कृति चर्चा का इतिहास हमें यह बतलाता है कि 'हम एक हैं' इस भावना का सुसंगत समाशास्त्रीय पाठ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही तैयार हुआ। देश के माने बदले और नवजागरण के साथ देश के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का एक पाठ तैयार हुआ। इस पाठ की बहुत सारी अच्छी-बरी बातों, - राष्ट्रीय आन्दोलन, नवजागरण, हिन्दू नवजागरण, इस्लामिक नवजागरण इत्यादि के व्याख्याकारो की लोगों ने आलोचना लिखी है। यह सब जानते हैं कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में इस राष्ट्रीय पाठ को एक गम्भीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वह चुनौती दलित सांस्कृतिक आन्दोलन की ओर आयी है। मैं स्त्री विमर्श को पूरी बातचीत में नहीं रख पाया, क्योंकि समय की भी सीमा है और स्त्री विमर्श लाने से बात को दूसरी तरफ भी ले जाना पड़ेगा, लेकिन मूलरूप से मुझे लगता है कि जो दलित सांस्कृतिक आन्दोलन हुआ है, उसके साथ सांस्कृतिक विमर्श को जोड़ना पड़ेगा। वरना लोग कहने लगेंगे कि हमारी संस्कृति और है और आपकी संस्कृति और। इस तरह से हमारी जो सांस्कृतिक दृष्टि है, उसका विखण्डन शुरू होगा, जो कहीं भी नहीं थमेगा।, किसी मूल्य को तैयार नहीं होने देगा और इतने सारे मूल्य हो जायेंगे कि सांस्कृतिक विमर्श एक अर्थ में कल्पना का व्यायाम बनकर रह जायगा।

पिछले तीस सालों में, राजनीति, सामाजिक संतुलन, आर्थिक संरचना इत्यादि सभी चीजें बदल गयी हैं। हमारे भारत में भी हम देख रहे हैं कि ग्लोबलाइजेशन के इस युग में सारी चीजें टूटने-फूटने लगी हैं। तो, ये तीस साल बहुत महत्त्वपूर्ण हैं जिनमें हमारी दृष्टि बदली है। ऐसे में पुरानी सांस्कृतिक दृष्टि, जिसके पीछे एक राष्ट्रीय दर्शन था, उसकी सीमाएँ भी थोड़ी स्पष्ट होती जा रही हैं। लोग पूछने लगे हैं कि जो चित्र आप दिखा रहे हैं, संस्कृति का यह बहुत सुन्दर चेहरा, बहुत भव्य चेहरा जो दिख रहा है, उसमें हम कहाँ हैं। हम जिस समुदाय से आते हैं, हमलोग जहाँ से हैं, वह चेहरा हमें दिखाई नहीं दे रहा है। यह बात स्त्री के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है और दलित के सन्दर्भ में भी कही जा सकती है। दलित विचारधारा का जब से समाज में प्रभाव बढ़ा है, तब से संस्कृति को पुनर्परिभाषित किये जाने की जरूरत होने लगी है। इस प्रसंग में नये सवालों पर पर्याप्त चर्चा हो चुकी है, लेकिन यहाँ एक प्रसंग जोड़ना मुझे जरूरी लगता है। संस्कृति के संक्रमण काल का समाजशास्त्र इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि एक गलती के सुधारने के क्रम में एक और बड़ी गलती भी हो सकती है। संस्कृति का जैसा भी पाठ राष्ट्रीय दौर में तैयार हुआ था, उसमें परम्परा के प्रति समग्र दृष्टि भले ही न हो, एक सकारात्मक भाव था। उन्हें एक नया कल्याणकारी समाज बनाना था और इस देश से विदेशियों को हटाना था। हम चाहें तो इस युग में गांधी और नेहरू की चाहे जितनी आलोचना कर लें, लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि उनकी दृष्टि सकारात्मक थी। वह चाहते थे कि देश बने, और उस देशवासियों के बीच में एक सुन्दर सम्पर्क बने, उनके बीच में एक रागात्मक-भावात्मक सम्पर्क हो। उनकी सीमाएँ हो सकती हैं किन्तु उनकी मंशा प्रभावशाली है। जैस-जैसे समय बदलता है, वैसे-वैसे किसी भी विचार दर्शन की सीमाएँ भी स्पष्ट होती जाती हैं। पर उस विचार दर्शैन का सकारात्मक भाव हमें मानना ही चाहिए।

लेकिन इन दिनों जो दौर चल रहा है, उसमें एक प्रकार की उग्रता है। परम्परा की बहुत ही फूहड़ समझ है। मैं फूहड़ शब्द का प्रयोग बहुत .जोर देकर करना चाहता हूँ। परम्परा को इस प्रकार मनचाहा आकार देना चाहिए। यह सही है कि बहुत सारी परम्पराएं हो सकती हैं, बहुत सारी दृष्टियाँ भी हो सकती हैं, लेकिन अपनी दृष्टि को सामने लाने के क्रम में हम दूसरी सारी परम्पराओं का निषेध कर दें, यह बात भारतीय सन्दर्भ में मुझे बहुत ही विध्वंसकारी प्रतीत होती है। आज परम्परा की समझ बहुत फूहड़ है और उस पर राजनीति का पूरा जोर है। संस्कृति के लिए यह बहुत खतरनाक है । जहाँ संस्कृति के विमर्श में राजनीति की दखलअन्दाजी बढ़ने लगे, वहाँ समझना चाहिए कि संकट बहुत गहरा हो रहा है और वहाँ से निकलने की गुंजाइश भी कम होती जा रही है। जो लोग संस्कृति के नये मूल्यों को तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं वे राजनीति से प्रेरित दिखते हैं। राजनीति का प्रभाव स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन राजनीति से प्रेरित संस्कृति विमर्श की ओर आना, और पूरे अकादमिक क्षेत्र को उसका पिछलग्गू बना देना, यह बात मुझे सही नहीं लगती है।

संस्कृति विमर्शा के लिये यह जरूरी है कि इसे राजनीति के दिशा निर्देश पर न चलाया जाये, बल्कि समाज के कल्याण को ध्यान में रखकर विकसित किया जाये। हमें आशा करनी चाहिए कि इस मन्थन से कुछ जो नये मूल्य निकलेंगे, वे समाज के लिए कल्याणकारी होंगे।

संस्कृति केवल वर्चस्व का साधन ही नहीं बनती, वह मुक्ति का माध्यम भी होती है। फ्रेंकफुर्त स्कूल के एक विद्वान पचास साल से भी ज्यादा पहले से इस बात को दिखला चुके थे कि संस्कृति उद्योग कैसे बन गया है. संस्कृति में पूँजी को, पैसे को हम इतनी छूट दे सकते हैं कि वह संस्कृति के पूरे विमर्श को नियन्त्रित करे ? मैं बा.जार के साथ-साथ राजनीति को भी इसके लिए बहुत बड़ा खतरा मानता हूँ जो विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है और जो संस्कृति के प्रति समाज में एक सम्यक्‌ दृष्टि का प्रसार जो संस्कृति कर्मियों का उद्देश्य है, साहित्यकारों का उद्देश्य है, उसको बाधित करती है और उसकी जगह पर एक अजीब तरह का कोलाहल पैदा किया जाता है। इस कोलाहल से यह बताया जाता है कि सच कुछ भी नहीं है, सब कुछ कल्पना है। पश्चिम में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं कि इतिहास कुछ है ही नहीं। हेडेन व्हाइट जैसे लोग यह प्रचारित कर रहे हैं कि पूरी चीज ही कल्पना है। एक स्तर पर कल्पना है भी। लेकिन फिर भी हमें अगर मूल्यों की चिंता करनी है, तो इस बारे में दुबारा ठहरकर बहुत सुचिन्तित तरीके से सोचना पड़ेगा कि इसमें सकारात्मक क्या है और इसके विनाशकारी तत्व कौन से हैं। और तभी हम संस्कृति और साहित्य की सही और सच्ची भारतीय सांस्कृतिक समझ को सामने रख पायेंगे।

Saturday, 5 March, 2011