Sunday, 21 February, 2010

मुस्लिम लीग की विभाजोन्मुखी राजनीति : हिन्दी उपन्यासों के झरोखे से
डॉ. गिरीश चन्द्र पाण्डेय
इतिहास को साहित्य के माध्यम से समझने के प्रयास के क्रम में यह समझना जरूरी है कि जिस प्रकार वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति और उसे लेकर लोगों में हुई प्रतिक्रिया के बीच अंतर होता है, उसी तरह एक ऐतिहासिक स्थिति और उसे दिमाग में रखकर लिखी गयी रचना के बीच भी अंतर होता है। इसलिए ऐतिहासिक यथार्थ के अधिकाधिक निकट पहुँचने के लिये यह आवश्यक है कि साहित्य की तमाम विधाओं में हुए लेखन के माध्यम से वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास किया जाऐ। ऐसा लेखन साहित्य और इतिहास के रिश्तों में भी नई चमक भर देगा । इतिहास और साहित्य की जुगलबन्दी से कौन परिचित नहीं हैं ? कभी इतिहास आगे चलता है तो कभी साहित्य। दोनों के हमकदम होने के असंख्य उदाहरण हैं। एक प्रचलित धारणा के अनुसार इतिहास में तथ्यों के अलावा सबकुछ झूठ होता है और साहित्य में तथ्यों के अलावा सबकुछ सत्य होता है। यानि इतिहास से तथ्य लिये जायें और साहित्य से तथ्येतर विवरण ।
यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो वह इतिहास के लिये बहुत ही उपयोगी सामग्री हो सकती है। इसलिए प्रत्यक्ष अध्ययन का हिमायती होते हुए भी व्यक्ति को साहित्य के माध्यम से समाज में होने वाले परिवर्तनों को समझने की कोशिश भी करनी चाहिये । प्रेमचंद, रेणु, श्रीलाल शुक्ल, भीष्म साहनी, राही मासूम रजा, कृष्णा सोबती की रचनायें साहित्यिक रचनाओं के साथ ही समाज-वैज्ञानिक दस्तावेज भी हैं। भारतीय ग्रामीण जीवन को उन्होने सकारात्मक दृष्टि से और साहित्यकार की तीसरी आँख से देखा है और उसके कुछ ऐसे पहलुओं के सूक्ष्म तत्वों की मार्मिक विवेचना की है जो हमारी शुष्क वैज्ञानिक दृष्टि एवं कष्टसाध्य सांख्यकीय विच्च्लेषण की पकड़ में नहीं आते ।
उपन्यास जिन्दगी के सबसे नजदीक की साहित्यिक विधा है. देश और काल के परिवर्तन संदर्भो से जुड़े होने के कारण उपन्यास का रुप भी बदला है, किन्तु यह निशिचत है कि सृजनात्मक गद्य में आज वह लोकप्रियता के च्चिखर पर है।5........हिन्दी उपन्यास की उल्लेखनीय सफलताओं के बाबजूद, भारत के सामाजिक यथार्थ के आकलन में उसकी सीमायें और न्यूनतायें चुभने वाली हैं। इतिहास की कई विराट लहरों ने इस विधा को छुआ ही नहीं । देश के विभाजन जैसी त्रासदी पर एक भी सशक्त और हिला देने वाला उपन्यास नहीं लिखा गया । 6 उपन्यास साहित्य में तत्कालीन परिस्थितियों का विच्चेष उल्लेख मिलता है। उपन्यास ÷झूठा-सच'7,÷तमस'8 और ÷इंसान मर गया' 9, मुठ्ठी भर कांकर' 10, ÷जुलूस'11, ÷वह फिर नहीं आई', ÷पिंजर'12, ÷कुली के बेटे', ÷बयालीस', ÷भूले बिसरे चित्र'13 आदि विच्चेष उल्लेखनीय हैं।
सबसे पहले ÷तमस'......÷तमस' पंजाब के गांवों की कहानी है, देश के विभाजन की भी । नौकरच्चाही पर भी भीष्म साहनी की पैनी दृष्टि गयी है। कथानक में ÷फूट पैदा करो और राज करो' के सिद्धांत को यदि वे अधिक स्वाभाविक और संयत ढंग से प्रस्तुत कर सकते तो उनकी यह रचना निःसंदेह अधिक सशक्त बन पड़ती ।..........÷जिन्दगीनामा '14 में एक विच्चिष्ट काल और भूखण्ड़ की जन-संस्कृति की आकर्षक झांकी मिलती है। इस उपन्यास में न कोई कथासूत्र है, न कोई नायक-नायिका , इसमें है लोकजीवन के बदलते रंग और आने वाले तूफान के संकेत । और भी बहुत कुछ है जिसे पाने के लिये प्रयास अपेक्षित है।..........राही मासूम रजा लिखित ÷आधा गाँव'15 भी एक उल्लेखनीय रचना है। भारतीय मुसलमानों का विखिण्ड़त व्यक्तित्व उसका गौण पक्ष है, ग्रामीण परिवेश में उनके दुःख-दर्द की कहानी उसका मुख्य भाग है। ग्रामीण पृष्ठभूमि में भारतीय मुसमानों का इतना मार्मिक चित्रण शायद दूसरी जगह नहीं हुआ।16 राही मासूम रजा हिन्दी में एक तूफान की तरह आये। उनका मुहावरा हिन्दी के लिये अपरिचित सा है और उनकी अनगढ़ शैली यदि एक बार चौंकाती है तो दूसरी बार आकर्षित भी करती है।÷आधा गाँव ' उनकी विच्चिष्ट रचना है, यद्यपि उनकी दूसरी कई किताबों में भी आंच्चिक रुप से गाँव आते है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में गंगौली एक मध्यम आकार का गाँव है जिसमें हिन्दू भी बसते हैं, मुसलमान भी। ÷आधा गाँव' उपन्यास की शक्ल में गंगौली और उसके निवासियों की कहानी है जहाँ परम्परायें अभी भी जीवित हैं, पर माहौल बड़ी तेजी से बदल रहा है। राही की भाषा बोलचाल की भाषा है। गाँव के हर तबके से पात्र उन्होंने चुने हैं और उनका चित्रण करने में उन्हें एक सी सफलता मिली है। यहाँ भी भारतीयता की तलाश है, साथ ही जड़ों की खोज भी है। जनजीवन के दुखः-दर्द की इस कहानी में झूठी मान-मर्यादाओं का चित्रण भी हुआ है। शायद ही किसी उपन्यासकार ने हिन्दुस्तान के मुसलमानों को उनके परिवेश से जोड़कर इतनी सफलता से प्रस्तुत किया हो। राही कभी-कभी तटस्थता खो बैठते हैं पर उनकी टिप्पणियाँ बहुत चुभती हैं।17 साहित्य की जड़े समाज में होती है। वह स्वयं एक सामाजिक उत्पादन है। वह अपनी सामाजिक भूमिका के कारण ही मानवीय परम्परा का अंग बन सका है।18 साहित्य परम्पराओं के प्रेषण का एक मुख्य माध्यम है, उसके द्वारा परम्परायें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहँुचती है। व्यक्ति, समूह और समाज सम्बंधी प्रतिमान और परिकल्पनायें दोनों साहित्य में अभिव्यक्त होती हैं। जीवन दृष्टि एवं मूल्यों के प्रेषण में भी उसका उल्लेखनीय योगदान है।19
अभी तक साहित्य का जिस तरह से उल्लेख किया गया है, उससे यह भ्रम हो सकता है कि वह कोई एकीकृत इकाई है और उसकी एक समन्वित दृष्टि हैं।.........आज साहित्य में एक नहीं, अनेक स्वर हैं, कई जीवन-दृष्टियाँ हैं। समाज में अलग-अलग स्थितियों और स्तरों पर पाये जाने वाले दृष्टिभेद और विचार-संधर्ष की प्रतिध्वनि साहित्य में सुनाई पड़ती हैं। वह अतीत का चित्रण और मूल्यांकन अलग-अलग दृष्टियों से करता है, उसकी आलोचकीय दृष्टि में विविधता है और विकल्पों के सम्बंध में वह एकमत नहीं हैं।20
कलम से की गयी क्रांति पहले कागज पर ही आती है और उसकी बहुत सी गर्मी वहीं समाप्त हो जाती है। वास्तविक क्रांति के कारकों में साहित्य भी एक हो सकता है पर सिर्फ साहित्य से ऐसी कोई क्रांति कभी नहीं हुई । प्रतिबद्धता अपने आप में एक सामाजिक मूल्य है और रचनाकर्म की ईमानदारी एक अपेक्षित गुण है, पर प्रतिबद्ध लेखन के सामाजिक प्रभावों के बारे में किये गये बड़े-बड़े दावे महज लेखन के महत्व को बढाने के प्रयत्न ही माने जा सकते हैं। शब्द क्रांति सामाजिक क्रांति नहीं होती।21
सबसे महत्वपूर्ण प्रच्च्न हैः साहित्य किस प्रकार का संदेश लेकर अपने पाठकों के पास जाता है ? क्या इस संदेश और पाठक की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं में तालमेल है ? क्या संदेश युग-युग पूजित विच्च्वासों से टकराकर व्यक्ति और व्यवस्था तथा उसके न्यस्त हितों के लिये संकट उत्पन्ना करता है ? साथ ही संदेश की शैली और उसका मुहावरा भी उसके प्रभाव को बढ़ा या घटा सकता है। ऐसे समाजों में जहाँ साहित्य की पहुँच सीमित हो, साक्षरों की संख्या कम हो, साहित्यक अभिरुचि का धरातल विकसित न हो, साहित्यकार अपने प्रति विच्च्वास की भावना उत्पन्न न कर सका हो, लेखन की भाषा और शैली में जनमानस की पकड़ न हो, अभिव्यक्ति पर नियंत्रण हो और चिंतन-लेखन समाज की प्रवृत्तियों से बहुत आगे या पीछे हो, साहित्य से व्यापक और सशक्त प्रभाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती।22
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि समाज या पाठक की नजरों में ÷साहित्य का सत्य' और ÷जीवन का सत्य' एक नहीें होते, उनके धरातल भिन्ना होते हैं।23
20वीं शताब्दी के पहले दशक में हिन्दू-मुस्लिम सम्बंधों में काफी मेल-मिलाप के बावजूद उनमें अभी भी कुछ रुढ़ियाँ और छुआछूत चला आ रहा था। हिन्दू घरों में मुसलमानों के लिये एक आलमारी में कांच के दो-तीन गिलास रहते थे।24 यहाँ तक कि हिन्दू-मुसलमानों के नेचे भी अलग हुआ करते थे। जब वह एक साथ हुक्का पीते थे तब भी हुक्के नेचे में जात बिरादरी का परहेज मुख में ली जाने वाली नली-निगाली का होता था।25कबीर के शब्दों में ÷वेच्च्या के पावन तर' सोने वाले हिन्दू भी उनके हाथ के निवाले नहीं ग्रहण करते थे। हिन्दू औरत मुसलमान से उलझ जाये तो औरत को मुसलमान बनना पड़े। हिन्दू मर्द चाहे जिस हैसियत का हो, मुसलमान औरत को घर में लाये तो हिन्दू ही उसे मुसलमान बना दें।26 इतना ही नहीं, हिन्दुओं के यहाँ कंधे पर लाल अंगोछा रखे कहार और मुसलमान परिवारों में कमर पर हरा-नीला अंगोछा बांधे भिच्च्ती चमड़े की मशको से पानी पहँुचाते थे। रेल स्टेशनों पर ÷हिन्दू पानी' और ÷मुस्लिम पानी' अलग-अलग होता था। उसी तरह खाने-पीने की भी हिन्दू-मुसलमान दुकानें पृथक्‌-पृथक्‌ थीं । अंग्रेज सरकार जनता की साम्प्रदायिक भावना के प्रति विच्चेष कृपालु थी। और तो और नल में चमड़ा लगी टोंटी से पानी पिया तो मशक का पानी पिया..........मशक का पानी पिया तो मुसलमान का पानी पिया।27 ऐसी धारणा थी हिन्दू समाज की।
यूनाइटेड प्राविन्स के मुस्लिम जमींदार एंव तालुकेदारों की माली हालत खासी खराब थी।28 लखनऊ में नवाबी रक्त का दम भरने वाले निरक्षर लोग समय के प्रभाव से छोटी-छोटी दस्तकारियों से निर्वाह कर रहे थे। जमीन बनियों, खत्रियों एवं रस्तोगियों के हाथ बिककर पक्के मकान बनते जा रहे थे।29
हिन्दू-मुस्लिम सम्बंध जो लगातार बिगड़ते जा रहे उसका बहुत ही सटीक चित्रण यशपाल अपने ÷मेरी तेरी उसकी बात' में करते हैं। उनके उपन्यास का एक पात्र कांग्रेस और गाँधी के बारे में क्या कहता है, बानगी देखिये-
त्रिपुरी अधिवेशन के समय काले खाँ ने कहा, "तुम्हारी कांग्रेस हिन्दू जमात। गाँधी हिन्दुओं का पोप है।''30
1939 में विच्च्वयुद्ध में शामिल होने के वॉयसराय के फैसले के विरुद्ध कांग्रेस ने, जिसकी ग्यारह में से नौ राज्य में सरकारें थी, 30 अक्टूबर, 1939 को त्यागपत्र दे दिया।31 कांग्रेस के मंत्री पदत्याग देने की धोषणा पर मुस्लिम लीग ने योमेनिजात ;मुक्ति दिवस; का उत्सव मनाने की धोषणा कर दी।32
''........लखनऊ में मुसलमानों के जुलूस की बहुत बड़ी तैयारी । जगह-जगह मुसलमानों की सभाओं में कांग्रेसी हिन्दूराज में मुसलमानों के दमन के प्रति क्षोभ : कांग्रेसी अमलदारी में मुसलमानों की जिस कदर हकतलफी की गयी, वह किसी तरह गवारा नहीं की जा सकती। जब तक मुसलमानों की रगों में एक बूंद भी खून बाकी है, हिन्दू कांग्रेस का राज कायम नहीं हो सकेगा। हम मुहम्मद गोरी, महमूद गजनवी और नादिरच्चाह के वारिस है। हमने इस मुल्क को शमच्चीर से फतह किया था । मुसलमान इस मुल्क में हिन्दूओं के गुलाम बनकर नहीं रह सकते। जब तक सल्तनते बर्तानिया कायम है, हम उसकी वफादार रियाया हैं लेकिन मुसलमान हिन्दू हुकूमत बर्दाच्च्त नहीं करेंगे .......।33''
संयुक्त प्रांत के लखनऊ में भी मुस्लिम लीग मुसलमानों को लामबंद कर रही थी । बकौल यशपाल-
"कांग्रेसी और हिन्दू चकित। उस समय तक नगर या प्रदेश में मुस्लिम लीग का विच्चेष प्रभाव नहीं था। नगर के अनेक प्रभावच्चाली मुस्लिम नेता और रईस-बैरिस्टर खलीकुज्जमाँ, 34 राजा महमूदाबाद, 35 मौलना हसरत मोहानी, 36 मदनी नदीम साहब 37 वगैरह कांग्रेस के साथ थे। मुसलमानों में मुख्य प्रभाव था ÷अहरार पार्टी'38 का या ÷जमायत उल उलेमा' 39 का। ये दोनों दल कांग्रेस में सम्मिलित न होकर भी कांग्रेस के सहयोगी संगठनों के रुप में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कांग्रेस का साथ दे रहे थे। देशभक्ति की पोच्चाक खद्दर पहनते थे, सत्याग्रह और असहयोग में भाग लेते थे। अब सहसा मुसलमानों का बहुमत मुस्लिम लीग के साथ। अब खलीकुज्जमाँ, राजा महमूदाबाद, कानपुर के मौलना हसरत मोहानी,मौलाना मदनी सब लीग में सम्मिलित। महीने भर में मुसलमानों की बड़ी संख्या लाल तुर्की टोपी, काली शेरवानी और सफेद पैजामा की मुस्लिम लीगी पोच्चाक में दिखने लगी। लीग का कार्यक्रम हिन्दू कांग्रेस का विरोध।
लखनऊ में मुस्लिम लीग का विराट जुलूस निकला-बहुत उत्तेजक जुझारु नारे। हिन्दूओं के आच्च्वासन के लिए नगर भर में सशस्त्र और घुड़सवार पुलिस की कड़ी चौकसी। जुलूस को निशिचत रास्तों से चलना पड़ा। पुलिस को कड़ा निर्देश, कोई झगड़ा न हो सके। द्वेषपूर्ण नारों की पूरी छूट। जुलूस के बावजूद सब कुछ यथावत परन्तु हिन्दू-मुसलमानों में परस्पर पूर्वापेक्षा अधिक द्वेष। मुसलमानों को भरोसा, अंग्रेज सरकार उनकी सहायक है।40
मुस्लिम लीग आम मुसलमानों को लामबंद करने के लिये व्यक्तिगत सम्बधों का उपयोग करने से भी नहीं चूकी। घर-घर में मतभेद पैदा हो गये । बानगी देखिये -
रजा की परेच्चानी का आरम्भ 1939 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों के इस्तीफे देने पर मुस्लिम लीग द्वारा ÷यौमेनजात' मनाने के अवसर से आरम्भ हुआ था........रजा पर समद का एहसान था। उसे सर्जरी में लेक्चररच्चिप दिलाने में समद ने मुस्लिम के नाते उसकी सहायता की थी । समद लीगी था। अतः वह बार-बार "यौमेनजात'' जलसे में शमिल न होने के लिये रजा को ताने देता रहता। नौकरी में सीनियर से झगड़ा पानी में रहकर मगर से बैर।
लीग को सहयोग न देने से रजा के परिवार में भी असंतोष। परिवार में उसका समर्थक और मित्र था उसका साढ़ू वकील फजल अहमद। 1939 तक फजल अहमद मजहब के मामले में सहिष्णु, विचारों से नेशनलिस्ट था। उसने "यौमेनजात'' में भी सहयोग नहीं दिया था परन्तु वह भी शनैः शनैः लीगी बनता चला गया। परिणाम उसकी वकालत के लिये अच्छा हो रहा था। सन्‌÷40 के अंत तक वह इतना पक्का लीगी कि मद्रास में मुस्लिम लीग अधिवेशन के लिये लखनऊ से डेलीगेट चुन लिया गया और उसके लिये लीग की ओर से इतने लम्बे सफर के खर्च का भी प्रबंध हो गया। मद्रास में लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव पास कर दिया था। लीग के मद्रास अधिवेशन के बाद यू0 पी0 में पाकिस्तान की मांग को लेकर लीग की गतिविधियों में बहुत वेग आ गया। वकील फजल अहमद लीग की प्रांतीय शाखा के प्रचार कार्य का उपमंत्री बन गया । उसकी स्थिति एवं प्रभाव में बहुत अंतर। सरकारी अफसरों से मिलना-जुलना बढ़ गया।...........फजल अहमद का व्यवहार अब भी मजहबी कट्टरता या असहिष्णुता का न था। वह लीग को साम्प्रदायिक संगठन नहीं, मुसलमानों का राजनैतिक संगठन मानता था। वह नमाज-रोजे की अपेक्षा मुसलमानों में राजनैतिक जागृति और संगठन को महत्व देता था। उसका कहना था कि पाकिस्तान लीग का जुझारु नारा है। इस समय ब्रिटेन इंण्डिया को जनतांत्रिक या शासन अधिकार सौपता है तो उसका अर्थ हिन्दू कांग्रेस का प्रभुत्व होना। हमें जनवाद की अपेक्षा मुस्लिम कौम का लाभ देखना है। युद्ध के बाद अंग्रेज हिन्दुस्तान को अधिक स्वच्चासन के अधिकार देने के लिये मजबूर होंगे। उस स्थिति में मुसलमान अल्पसंख्यक होने के नाते घाटे में क्यँू रहें। मुसलमानों का लाभ बहु की संख्या में खो जाने में नहीं, अपनी पृथक स्थिति रखने में है।
सरकारी नौकरियों के माध्यम से किस प्रकार हिन्दू-मुस्लिम मतभेदों को बढ़ाया जाता था, इसके लिये सरकारी कर्मचारी सूरत सिंह का वक्तव्य दृष्टव्य है-
"अंग्रेज अफसर मुसलमानों को शह दे रहे हैं........ पहले भी दस में चार नौकरियाँ मुसलमानों को दी जाती थी, अब आठ-नौ।''
संसार के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं, जब वर्षो से मित्रों की भँाति निवास करने वाली दो जातियाँ धार्मिक अनुदारता, पारस्परिक वैमनस्य और अविच्च्वास के कारण धीरे-धीरे एक दूसरे की शत्रु बन गयी हों और जिनकी शत्रुता ने एक अखण्ड़ भू-भाग के टुकड़े कर डाले हों। बीसवीं शतब्दी की इस ऐतिहासिक एवं परिवर्तनकारी घटनाओं और उसकी कल्पनातीत परिणति ने हिन्दी साहित्यकार को किस सीमा तक प्रभावित किया यह जानना आवश्य्क हो जाता है। तत्कालीन ऐतिहासिक घटनाओं के प्रति रचनाकारों का सामान्य दृष्टिकोण क्या रहा एवं अपनी कृतियों में उन्होंने इस करुणाजनक प्रसंग का चित्रण किस रुप में किया, यही जानना इस लेख का अभीष्ठ है। अन्य भाषाओं के तमाम साहित्यकारों ने भी इसे अपने साहित्य में चित्रित किया है। इन सबका एक जगह संकलन किया जाना उचित होगा।
मुस्लिम लीग अब ;1940 के बाद; इस्लाम धर्मावलम्बियों के उस वर्ग से सम्बंधित थी जिसकी परिकल्पना एक पवित्र देश ;पाकिस्तान; से जुड़ी हुई थी। 1857 ई0 मुगल साम्राज्य की समाप्ति के साथ भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के एक छोटे, किन्तु प्रभावच्चाली समुदाय में हताच्चा और भय की भावना ही परिव्याप्त नहीं हुई बल्कि यह मनोभाव भी पैदा हुआ कि फिरंगियों द्वारा शासित राज्य में इस्लाम का आस्त्वि संकटग्रस्त हो गया है। स्वभावतः कुछ लोगों ने अपने धर्म को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए भारत के परित्याग का आंदोलन किया और इस क्रम में बहुत से भारतीय मुसलमान अफगानिस्तान, ईरान ,सऊदी अरब आदि देच्चों में जा कर बस गये।सौदा ने जब यह कहा कि खुरासान के बादच्चाह की कृपा हो तो मैं भारत की नापाक जमीन पर सिजदा न करुँ-"सिजदा न करुँ हिन्द की नापाक जमीं पर'' -तो वह यही कह रहे थे कि भारतभूमि अब पाक नही रह गई है और किसी पाक भूमि में ही भारतीय मुसलमानों का धर्म बचा रह सकता है। किन्तु कौन जानता था कि कभी स्वयं भारतभूमि को ही विभक्त कर मुसलमानों के लिये पवित्रभूमि या पाकिस्तान की स्थापना का आंदोलन होगा और साम्राज्यवादी शक्तियाँ इसे साकार कर देगीं ? धार्मिक विद्वेष और अविच्च्वास की जिस पृष्ठभूमि में भारत का विभाजन हुआ, उसने न केवल यहाँ के भूगोल को प्रभावित किया बल्कि समस्त सांस्कृतिक जीवन को भी। विभाजन के आंदोलन के अंतिम चरण में हजारों परिवार बिखर गये, मातृजाति का अकल्पनीय अपमान हुआ और रक्त का पूरा समुद्र बह गया। विभाजन के बाद तो और भी अमानवीय घटनायें हुई और आबादी का अभूतपूर्व विस्थापन हुआ। घृणा और धार्मिक विद्वेष के आवर्त में फंसे मनुष्य को, जो सिर्फ मनुष्य था-जो न हिन्दू था, न मुसलमान-क्या कुछ झेलना पड़ा, इसका अमूल्य दस्तावेज हिन्दी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवेश के साथ जीता है। उसी में उसका निर्माण और विकास होता है। लेखक सामान्य मनुष्य से अलग नहीं होता है। उसके ऊपर भी वे सब प्रभाव एक साथ पड़ते हैं। अंतर यही है कि जहाँ सामान्य आदमी अपनी चेतना और चिन्तन को अभिव्यक्त नहीं कर सकता, वहाँ लेखक उसे वाणी देता है। उसकी अनुभूतियाँ उसके भीतर आत्मसात होकर अनुगूँजें बन जाती है। अनुभूतियाँ एक दिन या एक वर्ष में नहीं उभरती। काल की कोई अवधि उसकी सीमा में नहीं है। कभी कोई ऐसा क्षण आता है जो सामान्य होते हुए भी चेतना की पकड़ में आ जाता है और वही सृजन क्षण बन जाता है। जब कोई लहर देश में उठती है तो साहित्यकार के लिये उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है और उसकी विच्चाल आत्मा मानवता के कष्टों से विकल हो उठती है और इस तीव्र विकलता मंम वह रो उठता है; पर उसके रुदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक होता है।42
1942 के आसपास पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ने लगी। यू0 पी0 के बलिया जिले में भी इसकी गूंज सुनाई पड़ने लगी। जब एक वकील गफूर कहता है कि
"इन इण्डिया डेमोक्रेसी इज ए डिप्पोक्रेसी। मुसलमान और हिन्दू चाहे एक नस्ल से हों लेकिन मज+हबी एतकाद और इक्तसादी मसायल से दो कौमें बन चुके हैं। तवारीख गवाह है, वज+ूहात जो भी रहे हो, दोनों नजदीक आने के बजाय फटते गये हैं। आज हम पाकिस्तान की मांग के लिये मजबूर हैं और इसे लेकर रहेंगे । अक्लियत पर अक्सरियत की हुकूमत को डेमोक्रेसी नहीं कहा जा सकता है........कांग्रेस और मुसलमानों को हुकूमत में आबादी की बिना पर नहीं, कौमियत और मजहब की बिना पर बराबर हकूक और हिस्सा होना जरुरी।43''
पाकिस्तान के पक्ष में कैसे-कैसे तर्क गढ़े जा रहे थे, कैसे-कैसे सपने दिखाये जा रहे थे , जरा उनकी बानगी तो देखिये-
"हिन्दू-मुसलमान दो कौमें, उनका किस बात में मेल । उनका साथ क्या ? इसलिये मुसलमानों के लिये अपना मुल्क जरुरी, पाकिस्तान। वहाँ सब सरकारी नौकरियाँ मुसलमानों को ही मिलेंगी। सब मुसलमानों की हैसियत अफसरान की होगी। सब करोबार मुसलमानों के हाथ में होंगे।44
बलिया जैसे छोटे से कस्बे में बीस-पच्चीस ऊँची तुर्की टोपियाँ, काली शेरवानियाँ और अलीगढ़ी पाजामे दिखाई देने लगे। कुछ मुस्लिम जवान, खासकर संदिग्ध कारोबारों से सम्बद्ध लोग, सीना फुलाकर चलते और धौंस देते-
"आने दो मौका देख लेगे सालों को। हिन्दुस्तान की हुकूमत अंग्रेज ने मुसलमानों से ली है और मुसलमान को ही लौटायेगा। साले दाल पीने वाले बनिया-बक्काल हुकूमत क्या जाने। हम अपने रीति रिवाज के मुताबिक ईदुज्जुहा पर बछिया-बछडे की कुर्बानी क्यों नही दे सकें ? किसकी हिम्मत है हमें रोकने की अैर मस्जिदों के सामने बाजा बजाने की......।''45
1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन के दौरान लीगियो ने अपने पार्टी झण्डे को लेकर भी वितण्डावाद खड़े किये। बंद के दौरान लीग के नेताओं ने मुसलमान दुकानदारों से दुकान खुली रखने का आग्रह किया नतीजा झगड़े पैदा होने लगे। बलिया में खलीफा यूसुफ की दुकान पर छः मास से उसके बेटे तकदीर अहमद अरजीनवीस ने मुस्लिम लीग का हरे कपड़े पर सफेद आधे चाँद का झण्ड़ा फहरा दिया था। उसके कई गाहक भड़कने लगे थे लेकिन बेटे का आग्रह, मिल्लत और मजहब के मुकाबले नफा-नुकसान का क्या सवाल ? लीग का झण्डा नहीं झुकेगा।46
लीग के साथ सहानुभूति रखने वाले मुस्लिमों के जेहन में पाकिस्तान का जो अक्स उभर रहा था, उसका आभास हमें वली जैसे पात्र के माध्यम से मिलता है-
"वली मु0 अली जिन्नाा का अनुयायी था। जिन्नाा हिन्दुस्तान के मुसलमानों को रुढियों की संकीर्णता से मुक्त कर टर्की की तरह एक आधुनिक सबल, राजनैतिक शक्ति बनाना चाहता था। वली को पूरा विच्च्वास था कि मुसलमान शरीर ,स्वास्थ्य,दिमाग और चरित्र में हिन्दुओं से बेहतर लेकिन मुसलमान च्चिक्षा,नौकरियों,व्यवसाय-रोजगार, राजनीति में हिन्दुओं से पिछड़े हुए। इस स्थिति का कारण हिन्दुओं का व्यवहारिक चातुर्य, धूर्तता, पुच्च्त दर पुच्च्त व्यवसायों और रोजगारों पर कब्जा। इसी के बल पर हिन्दू छोटे-मोटे गांवो से लेकर बड़े-बड़े शहरो तक सभी क्षेत्रों में मुसलमानों का शोषण कर रहे हैं।'' 47
मई, 1944 में वायसराय ने गाँधीजी को बिना किसी शर्त जेल से रिहा कर दिया। गाँधीजी ने मुक्त होते ही देश की सबसे विकट राजनीतिक गुत्थी साम्प्रदायिक या हिन्दू-मुस्लिम द्वंद्व को सुलझाने का प्रयास किया। सुलझाव कांग्रेस और लीग में समझौते द्वारा। सुलझाव का यत्न गँाधीजी ने किया मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना से पत्राचार द्वारा। गँाधीजी जनता में एकता की भावना और मनोवृति को बढ़ाने के लिये इन पत्रों को प्रकाच्चित करा देते। इस उद्देश्य् के लिये गँाधीजी राजनैतिक दलीलों और सौदेबाजी के बजाय हृदय परिर्वतन पर भरोसा करना चाहते थे। जनता इन पत्रों के लिये बहुत उत्सुक रहती। इस पत्राचार पर मुस्लिम लीग काडर की सोच को उजागर करती इन पंक्तियों को देखें-
"बाच्च्च्चाओ ;बादच्चाहों; हमारा लीडर फरेब में नहीं आ सकता । गँाधी का फरेब जाहिर। कभी भाई बनकर गुजराती में खत लिखता है,कभी फुसलाने के लिये उर्दू में, कभी अंग्रेजी में। कभी प्यारे भाई लिखेगा, कभी प्यारे दोस्त, कभी कायदे आजम। हर बार गिरगिट की तरह नया रंग। जिन्ना के वही लफ्ज, वही रवैया-मिस्टर गँाधी। और शेर खत लिखता सरकारी कानून जुबान अंग्रेजी में। कोई लारी-लप्पा नहीं। गँाधी चार खत से खुच्चामद करें, हमारे लीडर का एक जवाब। यार देखो, बनिये के फरेब की हद। कहता है-तुम्हारी सब शर्ते मंजूर ब्लैंक चेक देता है। अबे तू देने वाला कौन ? तुझसे मांगता कौन है ? मुसलमान के बाजू में ताकत है, जो लेना होगा खुद ही ले लेगा ।''
"बाच्च्च्चाओ, हिन्दू-मुसलमान की यूनिटी का मतलब क्या ? जिन्ना साहब ठोस सही बात कहता है-हिन्दू, मुसलमान दो अलग-अलग कौमें,दो अलग-अलग मज+हब। दोनों की जुबान अलग, दोनों को एक-दूसरे को छूना-देखना नागवार। गँाधी कह रहा है, दोनों भाई-भाई एक कौम। मुसलमान अपनी कौमियत नहीं जानते, अपने दोस्त-दुच्च्मन नहीें पहचानते ? हमें तुम बताओगे ? इससे बड़ा फरेब क्या ? और बनता है फकीर ।''
"बाच्च्च्चाओ दर हकीकत गँाधी चाहता है, मुसलमान उसे अपना लीडर कबूल कर लें। मुसलमान का लीडर कफिर कैसे हो सकताहै। जिस शख्स को रसूल पर एतकाद नहीं, मुसलमानों का लीडर कैसे हो सकता हैं........।48
लखनऊ के खाकसार49 खालिद का मानना था कि
"आर्थिक शोषण की चक्की में हिन्दू-मुसलमान के एक साथ पिसने की बातें-कांग्रेस की चालें है। मुस्लिम अवाम को रोजी-रोटी के सवाल से भटकाकर उन्हें अपने अपने असली मकसद पाकिस्तान से गुमराह करने के लिये।.........हिन्दू के लिये रोटी का सवाल जरुर अव्वल है,मुसलमान के लिये नहीं । मुसलमान के लिये अव्वल सवाल उसके एतकाद, दीन और कौमी-मज+हबी फराइज+ का है। हम रसूल के मुज+ाहिद हैं जो जि+हाद में तीन-तीन दिन बिना दाना-पानी, पेट पर पत्थर बांधे लडते रहे, हाथ से तलवार नहीं रखी। हमारे लिये अव्वल सवाल रोजी-रोटी नहीं, फर्जे+दीन हुकूमतेइलाही पाकिस्तान कायम करना है। हमारे सब मसायल का हल पाकिस्तान......।50
फणीच्च्वरनाथ रेणु ने भी मुस्लिम लीग की राजनीति पर बड़े ही सुंदर ढंग से प्रकाश डाला है। "मैला आंचल'' 51 में मुस्लिम लीग के एक नेता के बारे में उनके उपन्यास का एक पात्र कहता है-
कमरुद्दीबाबू कुंजडा है; बैगन की बिक्री से जमीेंदार हुए हैं; मुस्लींग के लीड़र है। कटिहार-पूर्णिया मोटर रोड के किनारे पर ही घर है। हमेच्चा हाकिम हुक्काम उनके यहाँ आते रहते हैं। महीने में साठ मुर्गियों का खर्च है। लोग कहते है कि नये इसडिओ जब आये तो सारे इलाके में यह बात मशहूर हो गयी कि बड़े कडे+ हाकिम हैं; किसी के यहाँ न तो जाते है और किसी का पान ही खाते हैं। लेकिन कमरुद्दीबाबू भी पीछा छोड़ने वाले आदमी नहीं। इसडिओ का डलेबर मुसलमान है। उसको कुरान की कसम देकर पान-सुपारी खाने के लिए दिया। बस, एक बार कटिहार से लौट रहे थे इसडिओ साहब, ठीक कमरुद्दीबाबू के घर के सामने आकर मोटरगाड़ी खराब हो गयी।दस बजे रात और इसडिओ साहब कहाँ जाते ?........उसके बाद से ही कमरुद्दीबाबू अँाख मूंदकर बिलेक करने लगे । एक बार पुरैनिया मिटिन में कंगरेसी खुच्चायबाबू ने हाकिम से कहा-"पबलिक बहुत च्चिकायत करती है।'' कमरुद्दीबाबू ने हंसते हुए पूछा-"हिन्दू पबलिक या मुसलमान ?'' हाकिम भी समझ गये- कमरुद्दीबाबू लीगी हैं, इसलिए लोग झूठमूठ दोख लगाते हैं।52
...........हिन्दू लोग हिन्दुस्तान में मुसलमान पाखिस्थान में चले जायेंगे। मुसलमान का हिस्सा सुराज पाखिस्थान में चला जावेगा ?............एकदम काटकर हिस्सा लेगा ? हाँ, जब हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई हैं तो भैयारी हिस्सा तो रकम आठ आने के हिसाब से ही मिलेगा।53
............डिल्ली में बांटबखरा करके सुराज मिला गया। जै!जै! इस्लामपुर पाखिस्थान में रहेगा या हिन्दुस्थान में ? पाखिस्थान में । अभी पाखिस्थान में मारे खुच्ची के खचाखच गोरु काट रहा होगा। ........ धत्‌ गोरु ने क्या बिगाडा है ? ......बडे भाग से मेरीगंज बच गया। दस मुसलमान भी होते तो पाखिस्थान लेकर ही छोड़ता।........दंगा हो रहा है। सुनते हैं कि डिल्ली, कलकत्ता, नखलौ, पटना सब जगह हिन्दू-मुसलमान में लड़ाई हो रही है। गाँव के गाँव साफ।......आग देते है।54
एकदम सब पगला गये हैं, मालूम होते है। गँाधीजी खिलाफत के जमाने से कह रहे हैं, हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई हैं। तैवारीजी भी गीत में, आज से पंद्रह-बीस बरस पहले कहिन हैः
चमके मंदिरवा में चांद
मसजिदवा में बंसी बजे
मिली रहू हिन्दू-मुसलमान
मान-अपमान तजो!
.........सो, गँाधीजी की बात काटकर जो लोग यह सब अंधेर कर रहे है, वे भी एक दिन अपनी गलती मान लेंगे।55
कलीमुद्दीनपुर पकिस्तान में जाते-जाते बच गया है। एक बार हल्ला हुआ कि गाँव का नाम इस्लामी है, इसलिये इसको..........।56
"मीनाबाजार''57में मण्टो ने समकालीन राजनीतिक उथल-पुथल के बीच मुसलमान किस तरह से सोच रहा था और दंगों में शामिल लोगों की मनोदच्चा पर प्रकाश डालते हुए लिखा :-
जब देश-विभाजन पर हिन्दू-मुसलमानों में खूरेज जंग जारी थी और हजारों आदमी रोजाना मरते थे, श्याम और मैं रावलपिण्डी से भागे हुए एक सिख-परिवार के पास बैठे थे। उस कुनबे के व्यक्ति अपने ताजा जख्मों की कहानी सुना रहे थे, जो बहुत ही दर्दनाक थी। च्च्याम प्रभावित हुए बिना न रह सका। वह हलचल जो उसके मस्तिष्क में मच रही थी, उसको मैं अच्दी तरह समझता था। जब हम वहाँ से विदा हुए तो मैने श्याम से कहा, "मैं मुसलमान हूँ। क्या तुम्हारा जी नहीं चाहता कि मेरी हत्या कर दो ? श्याम ने बड़ी संजीदगी से उत्तर दिया,"इस समय नहीं............लेकिन उस समय जब मैं मुसलमानों द्वारा किये गये अत्याचारों की दास्तान सुन रहा था, तुम्हें कत्ल कर सकता था।''
श्याम के मुँह से यह सुनकर मेरे हृदय को घक्का लगा। इस समय शायद मैं भी उसे कत्ल कर सकता-किन्तु, बाद में जब मैंने सोचा और उस समय और बाद के विचारों में धरती व आकाश का अंतर अनुभव किया, तो इन दंगों का मनोवैज्ञानिक पहलू मेरी समझ में आ गया जिसमें नित्य सैकडों निरपराध हिन्दू और बेगुनाह मुसलनान मौत के धाट उतरे जा रहे थे।
इस समय नही।.................. उस समय हाँ। क्यो ? आप सोचिये तो आपको इस क्यों के पीछे मनुष्य की प्रकृति और मानव स्वभाव में इस प्रच्च्न का सही उत्तर मिल जायेगा।58
चौदह अगस्त, 1947 का दिन मेरे सामने मनाया गया। पकिस्तान और भारत देश स्वतंत्र घोषित किये गये थे। लोग बहुत प्रसन्ना थे। मगर कत्ल और आग की वारदातें जारी थीं।स्वतंत्र भारत की जय के साथ-साथ पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे भी लगते थे। कांग्रेस के तिरंगे के साथ इस्लामी परचम भी लहराता था। पण्डित जवाहरलाल नेहरु और कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना दोनों के नारे बाजारों में गूंजते थे। समझ में नहीं आता था कि भारत अपनी मातृभूमि है या पाकिस्तान अपना वतन और वह लहू किसका है, जो हर रोज इतनी बेदर्दी से बहाया जा रहा है...............वे हड्डियाँ कहाँ जलाई जायेंगी या दफन की जायेंगी, जिन पर से मजहब और धर्म का गोच्च्त चीलें और गिद्ध नोंच-नोंच कर खा गये थे ? अब कि हम आजाद हुए हैं, हमारा गुलाम कौन होगा ? जब गुलाम थे, तो स्वतंत्रता की कल्पना कर सकते थे। अब स्वतंत्र हैं तो गुलामी की कल्पना उसकी रुपरेखा क्या होगी ? लेकिन प्रच्च्न यह है कि हम आजाद भी हुए हैं या नहीें ?
हिन्दू और मुसलमान धड़ाधड़ मर रहे थे। कैसे मर रहे थे, क्यों मर रहे थे - उन प्रच्च्नों के उत्तर भी भिन्न-भिन्न थे भारतीय उत्तर, पाकिस्तानी जवाब, अंग्रेजी आंसर। हर सवाल का जवाब मौजूद था। मगर इस सवाल का जवाब में वास्तविकता तलाश करने का सवाल पैदा होता तो उसका कोई उत्तर न मिलता। कोई कहता इसे गदर के खण्डहरों में ढ़ूढ़ो। कोई कहता नहीं, यह ईस्ट इण्डिया कम्पनी की हुकूमत में मिलेगा। कोई और पीछे हटकर मुगलिया खानदान के इतिहास में टटोलने के लिये कहता। सब पीछे ही पीछे हटते जाते थे और पेच्चेवर कातिल और लुटेरे बराबर आगे बढ़ते जा रहे थे और लहू और लोहे का ऐसा इतिहास लिख रहे थे, जिसका उदाहरण विच्च्व-इतिहास में कहीं भी नहीं मिलता।
भारत स्वतंत्र हो गया था। पाकिस्तान आस्तित्व में आते ही आजाद हो गया था। लेकिन इंसान दोनों में गुलाम था................ धर्मिक पागलपन एवं जनून का गुलाम .................पच्चुता और अत्याचार का गुलाम।59
यशपाल, रेणु और मण्टो के उपन्यासों के इस समीक्षात्मक अध्ययन से हमें जो तस्वीर मिलती है वह समाज के भिन्न एवं निम्नवर्गीय सोच को उजागर करती है। परम्परागत ढंग के ऐतिहासिक लेखन में ऐसी चीजें शायद ही परिलक्षित होती हैं। इस प्रकार के अध्ययनों की यही उपयोगिता है कि इनसे इतिहास के अंधेरे कोनों पर भी प्रकाश पड़ता है। विभाजन के दौरान हुई हिंसक वारदातों में कुल कितने लोग मरे, इसकी ठीक-ठीक जानकारी आज भी किसी को नहीं है। अनुमानतः 2 से 3 लाख लोगों के मरने का अनुमान लगाया जाता है। विभाजन की त्रासदी ने इतिहासकारों के अलावा समाज वैज्ञानिकों, लेखकों, कवियों और पत्रकारों को भी झकझोर कर रख दिया और उन्होंने भी हिंसा, दर्द एवं संघर्ष का चित्रण अपने लेखन के माध्यम से किया। इनके लेखन के पीछे एक महत्वपूर्ण धारणा यह काम कर रही थी कि जैसी त्रासदी उनकी पीढ़ी की मानवता को झेलनी पड़ी वैसी भावी पीढ़ी एवं राष्ट्र्र को न झेलनी पड़े।
हममें से कुछ ऐसे लोग हैं जो इतिहास के इस दुःखद अध्याय से सबक लेंगे और इस बात का प्रयास करेंगे कि ऐसी घटनायें फिर न दुहरायी जायें। जब तक साम्प्रदायिक और संकीर्ण प्रांतीयता वाले लोग आम आदमी के दिमाग में जहर भरते रहेंगे, जब तक अतिमत्वाकांक्षी भ्रष्टाचारी व्यक्ति जो पद और सत्तालोलुप हं,ै हमारे बीच रहेंगे तब तक हमारे लोग उसी प्रकार ठगे जाते रहेंग,े बरगलाये जाते रहेंगे जैसे लीगी नेताओं ने आम मुसलमान को ठगा और बरगलाया।60
हिन्दी उपन्यासों के सम्यक्‌ विच्च्लेषण से एक तथ्य तो साफ उभर कर सामने आता है कि हिंसा किसी भी रुप यहाँ प्रच्चंसित एवं समादृत नहीं है। सच्चाई तो यह है कि हिंसा की न सिर्फ निन्दा की गयी हैं बल्कि उसके सामुदायिक हिंसा के स्वरुप की आड़ में छिपे असामाजिक तत्वों, राजनीतिज्ञों एवं धार्मिक अतिवादियों की ओर भी इच्चारा किया। यह बात भी द्रष्टव्य है कि इन आख्यानों में इस विभाजन त्रासदी के "नायक'' बलात्कारी, अपहरण करने वाले और लूटपाट करने वाले नहीं हैं बल्कि वे स्त्री-पुरुष हैं जिन्होंने लोगों की मानवीय मदद की। हिंसक वारदातों के बीच चमकती ये स्वर्णिम रेखायें ही थी जिन्होंने हाथ बढ़ाकर मानवता का दामन थामा और लोगो की बिना किसी भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से मदद की। ऐसे ही व्यक्ति खुशदेव सिंह, जो पेच्चे से चिकित्सक थ,े ने लिखा :
प्रेम घृणा से कहीं ज्यादा मजबूत है, प्रेम घृणा से कहीं ज्यादा मजबूत है, प्रेम घृणा से कहीं ज्यादा मजबूत ह,ै प्रेम घृणा से कहीं ज्यादा मजबूत है और प्रेम किसी समय, किसी भी जगह पर घृणा से ज्यादा मजबूत है। जीवित रहने और घृणा करते रहने की तुलना में कहीं हजार गुना बेहतर है प्रेम करना और मर जाना ।61

संदर्भ एवं पाद टिपणियाँ
1. आनंद प्रकाश,"प्रथम स्वाधीनता संग्राम और साहित्य'' आजकल (दिल्ली : मई 2007), 61.
2हितेन्द्र पटेल, 1857 के "इतिहासों'' के सम्बंध में कुछ विचार, प्रगतिशील वसुधा 76, भोपाल, जनवरी-मार्च, 2008,102.
3.कुर्रतुल ऐन हैदर।
4.श्यामाचरण दूबे, "परम्परा, इतिहासबोध एवं संस्कृति'',129.
5.उपरोक्त, 137.
6.उपरोक्त, 139.
7.यशपाल।
8.भीष्म साहनी।
9.रामानंद सागर।
10.जगदीश चन्द्र।
11.फणीच्च्वरनाथ रेणु।
12.अमृता प्रीतम।
13.भगवती चरण वर्मा।
14.कृष्णा सोबती।
15.राही मासूम रजा।
16.श्यामाचरण दूबे, "परम्परा, इतिहासबोध एवं संस्कृति'',141.
17.उपरोक्त, 147.
18.उपरोक्त, 159.
19.उपरोक्त, 160.
20.उपरोक्त 161.
21.उपरोक्त 162.
22.उपरोक्त 163.
23.उपरोक्त 164.
24.यशपाल, " मेरी तेरी उसकी बात'' ,15.
25.उपरोक्त, 22.
26.उपरोक्त, 27.
27.उपरोक्त, 64.
28. पॉल आर0 ब्रास,"लैग्वेंज, रिलीजन एण्ड़ पॉलिटिक्स इन नार्थ इण्ड़िया '' (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस,1974)
29.यशपाल, " मेरी तेरी उसकी बात'' ,330.
30.उपरोक्त, 331.
31. हेक्टर बोलिथो, "जिन्ना :क्रियेटर ऑफ पाकिस्तान'' (लंदन ; जॉन म्यूर,े 1954), 124. जमील-उद-दीन अहमद, संपा0 , "सम रेसेण्ट स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ मि0 जिन्ना'' (लाहौर : अशरफ,1952), वा0 I , 110.
32.अनिता इंदर सिंह, "ओरिजिन्स ऑॅफ द पार्टीशन ऑफ इण्डिया'', 1936-1947 (दिल्ली,आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1987), 51
33..यशपाल, " मेरी तेरी उसकी बात'' ,354.
34.चौधरी खलीकुज्जमा, मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता और यू0 पी0 में कोलीशन कवायद में प्रमुख व्यक्ति के रुप में शामिल थे।
35.राजा महमूदाबाद, अवध के सबसे बड़े तालुकेदार, 1914 में मुस्लिम लीग के स्थायी अध्यक्ष बने।
36.मौलाना हसरत मोहनी, यू0 पी0 खिलाफत कमेटी के प्रमुख नेता।
37.मदनी नदीम साहब, यू0 पी0 मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता।
38.1926 के बाद अली बंधुओं से नाराज होकर पंजाब के तमाम खिलाफत नेताओं ने "अहरार पार्टी'' नामक अलग दल बनाया जो राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ सहानुभूति रखते थे।
39.जमायत उल उलेमा ए हिन्द, राष्ट्रवादी मुस्लिम उलेमा संगठन था।
40.यशपाल, " मेरी तेरी उसकी बात'' ,355.
41.
42.प्रेमचंद, "हंस'', अप्रैल 1932,40.
43.यशपाल, " मेरी तेरी उसकी बात'' ,508.
44.उपरोक्त, 508.
45.उपरोक्त, 509.
46.उपरोक्त, 515.
47.उपरोक्त, 586.
48.उपरोक्त, 593.
49.खाकसार पार्टी एक ऐसा मुस्लिम संगठन था जों वर्दी पहनता था और सैनिक कवायदें करता था। अल्लामा मशरीकी इसके प्रमुख थे।
50.यशपाल, " मेरी तेरी उसकी बात'' ,620.
51.फणीच्च्वरनाथ रेणु।
52.फणीच्च्वरनाथ रेणु, "मैला आंचल'', (नई दिल्ली,भारतीय ज्ञानपीठ), 75 ।
53.उपरोक्त, 218.
54.उपरोक्त, 223.
55.उपरोक्त, 232.
56.उपरोक्त, 293.
57.सआदत हसन मण्टो।
58.उपरोक्त, 70.
59.उपरोक्त 71-72.
60.जी0 डी0 खोसला, "स्टर्न रेकनिंग'' (दिल्ली,आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1989), 299.
61. मुच्चीरुल हसन, (संपा0), "इण्डिया पार्टीशन्ड'', वा0 II ,112. यह क्रम अभी भी जारी है, देखें राजमोहन गाँधी, "रेवेन्ज रीकन्सीलियेशन : अंडरस्टैंड़िग साऊथ एच्चियन हिस्ट्री'' (नई दिल्ली,1999); अहमद सलीम; "लाहौर 1947'' (नई दिल्ली,2001); और सैयद सिकंदर मेंहदी,"रिफ्यूजी मेमोरी इन इण्डिया एण्ड़ पाकिस्तान,'' ट्रांसयूरोपन्स में.