Wednesday, 22 December, 2010

अंग्रेजी का बढता दबाव और हिन्दी समाज के बौद्धिकों का दायित्व

बातचीत अंग्रेज़ी में गांधीजी पर हो रही थी. इतिहासकार शाहिद अमीन ने अपना मत रखा कि गांधीगिरी का प्रयोग उचित नहीं है और इस बात के समर्थन में वे एक पुराने गाने से 'दादागिरी नहीं चलने की यहां का उदाहरण दे रहे थे, अचानक गांधी के तुनुकमिज़ाज प्रपौत्र तुषार गांधी भडक गये. तुषार गांधी को शांत करने के लिए अंतत: बरखा दत्त हिन्दी में बोलीं- तुषार, उनको अपनी बात कहने दें. दत्त के हिन्दी में बोलने का सुयोग लेकर शाहिद अमीन हिन्दी में बोलने लगे और माहौल को सामान्य करने के लिए बाबा रामदेव आदि की बातें करने लगे. बातचीत का पूरा माहौल बदल गया. अब तक जो बातचीत एक कॉंवेंटी माहौल में हो रही थी वहां एक पल के लिए सहज वातावरण बन गया. इस तरह के अनुभवों के बाद यह सोचने का मन होता है कि क्या इस देश में यह बातचीत हिन्दी के सहज भाषाई परिवेश में नहीं हो सकती. अगर नहीं तो क्यों? क्यों इस देश के बडे लोग एक दूसरे से अंग्रेजी में इस तरह बातचीत करते हुए दिखाई पडते हैं. टी वी चैनलों पर हम क्यों ऐसा परिवेश तैयार करते हैं कि अधिकतर लोग असहज हो जाएं. देश के बडे लोग भी (राजनेता समेत) जब अंग्रेजी बोलने की कोशिश में असहज होते दिखलाई पडते हैं और धीरे धीरे वे तमाम लोग जो अंग्रेजी में सहज नहीं थे अब अंग्रेजी सीखने के लिए विवश हुए और अब अंग्रेजी में साक्षात्कार देते है तो यह प्रश्न मन में आता ही है कि हम इस देश में ऐसी संस्कृति को क्यों बढावा दे रहे हैं जिसमें इस देश के लोग अपने लोकप्रिय जन-माध्यम में इतना असहज हो जाता हो और इंग्लैण्ड और अमरीका का आदमी पूरी सहजता से भारत के जनमाध्यम में बोलता दिखलाई पडता हो.
हर समय का अपना एक कॉमन सेंस बनता है या बनाया जाता है जिसे उस समय के शक्तिशाली प्रभुवर्ग निर्मित करते हैं. 1990 के बाद से जब से इस देश में वैश्वीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है यह बात मान्य होने लगी है कि अंग्रेजी का ज्ञान हमारे लिए एक वरदान है और जो लोग दुनिया में आगे बढने की कोशिश करना चाहते हैं उनके लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है. यह एक दुष्प्रचार का परिणाम है कि पश्चिम बंगाल की सी पी एम सरकार सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद अब सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने की नीति पर अमल कर रही है. अंग्रेजी के बढते वर्चस्व के इस दौर में एक प्रकार की असहजता हर उस नागरिक में लक्षित की जा सकती है जो अंग्रेजी का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करने का अभ्यस्त नहीं है. जिस तरह से अंग्रेजी स्कूलों का जोर बढा है और देश की तमाम नौकरियों के लिए अंग्रेजी को जरूरी सा बनाने की सांस्थानिक कोशिशें तेज हुई हैं उसे देखते हुए इस देश में इस देश में यह एक बहस का मुद्दा बनना चाहिए कि इस युग में शिक्षित भारतीय क्या हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के बदले अंग्रेजी को इस देश में राजकाज, शिक्षा और दैनिक जीवन में तरजीह देने के लिए तैयार होने की दिशा में बढ रहा है या नहीं.
अंग्रेजी विरोध के आन्दोलन का युग बीत गया लगता है. जिस तरह हमारे सामाजिक जीवन के तीन क्षेत्रों - शिक्षा, मनोरंजन और राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व बढा है वह एक विचारणीय प्रश्न है. इस बिन्दु पर बहुधा लोग कुछ अतिप्रचलित उदाहरणों, उद्धरणों का प्रयोग करते हैं. जैसे- " कह दो गांधी को वह अंग्रेजी नहीं जानता", " मातृभाषा में ही हमारा स्वस्थ विकास हो सकता है " आदि आदि. इस तरह की बातों को दुहराते हुए, हिन्दी दिवसों का पालन करते हुए इसे अब झुठलाया नहीं जा सकता है कि इस देश में भाषा का मुद्दा एक खतरनाक मोड पर पहुंच गया है.
हिन्दी का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में "राष्ट्रीय" बनना एक विचारधारात्मक संघर्ष का परिणाम था. कम से कम जब से गांधी जी नेतृत्व में आये थे हिन्दी राष्ट्रीय आन्दोलन की भाषा बन गयी थी. एक बार बाल गंगाधर तिलक कलकत्ता के मछुआ बाज़ार में भाषण देने आए. गांधीजी हिन्दी में बोल चुके थे और तिलक को लगा कि अगर वे अंग्रेजी में बोलेंगे तो जनता पर अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं होगा. वे सार्वजनिक जीवन में पहली बार हिन्दी में बोले और इसका बहुत अच्छा प्रभाव पडा. इसके बाद तिलक हिन्दी में ही बोलने लगे. यह गांधी का ही प्रभाव था. कलकत्ता के शिक्षित लोग एक बार गांधीजी के सोदपुर आने पर उनसे आग्रह करने लगे कि वे हिन्दी में न बोलें. गांधीजी ने उनलोगों को फटकार लगाई और हिन्दी में बोले. वह एक बेहद दिलचस्प अध्याय है जिसमें 1927 में गांधी हिन्दी के पक्ष में इस तरह बोले कि आज का हिन्दी वाला भी शर्मा जाए. अपने आचरण से भी गांधी ने हिन्दी को बहुप्रचारित किया. गोविन्द बल्लभ पंत अल्मोडा में अंग्रेजी माध्यम से पढे थे और वे अंग्रेजी में गांधी को पत्र लिखते थे जिसका उत्तर गांधी हिन्दी में देते थे. शर्म आने पर पंत भी उन्हें हिन्दी में पत्र लिखने लगे. इस तरह के ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन गांधी की भाषा पर कम विचार किया जाता है. इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि गांधी के भाषणों और पत्रों का जो संकलन गांधी समग्र में आया है उनमें से अधिकतर पहले छपे अंग्रेजी वाड्गमय के हिन्दी अनुवाद है. मूल रूप से ये भाषण हिन्दी में दिए गए थे!
इन बातों को पुराने युग के कॉमन सेंस में इस लिए स्वीकृत माना गया था क्योंकि उस समय राष्ट्रीय स्वप्न और विचारधारा का जोर था जिसमें एक राष्ट्र, एक भाषा की बात को समर्थन था. सुदीप्त कविराज यह स्मरण कराते हैं कि इस देश में राष्ट्रीय स्वप्न ने भारतीय भाषाओं ने अपना स्वरूप तैयार किया था न कि अंग्रेजी में. उत्तर औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजी बनी रही और वैश्वीकरण के दौर में तो यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह नये 'इंडिया' की भाषा बन जायेगी.
इस ग्लोबल युग में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि इस देश में शासन और शिक्षा की असली भाषा अंग्रेजी ही है. आकडों को दिखला कर यह कहना कि इस देश में शिक्षा की भाषा भारतीय भाषाएं हैं एक छलावा ही है. जिसे हिन्दी माध्यम का स्कूल कॉलेज कहा जाता है वहां हिन्दी के अलावा सबकुछ अंग्रेजी में तैयार पाठ्यक्रमों का अनुवाद ही पढाया जाता है. दो तीन दशक पहले तक शिक्षकों की कोशिशों से कुछ प्रयत्न होते थे कि अन्य विषयों को भी हिन्दी में उचित तरीके से पढाया जाए पर अब सब कुछ मानो अंग्रेजी की नकल पर ही होने लगा है. लगभग हर समाजविज्ञान के क्षेत्र में सभी राष्ट्रीय संस्थाएं अंग्रेजी में काम करती हैं. तकनीकी क्षेत्रों की बात छोड ही दें जहां हिन्दी में काम करने में अपेक्षाकृत रूप में कठिनाई है. इसे क्या कहा जाए कि इतिहास अध्ययन के क्षेत्र में वार्षिक अधिवेशन में कोई भी पर्चा हिन्दी में नहीं छप सकता जबकि विकल्प देने पर कम से कम पचास फीसदी से ज्यादा पर्चे हिन्दी में प्रस्तुत किए जाएंगे. एक बार फ्रांस से पी एच डी किए लाल बहादुर वर्मा हिन्दी में पर्चा पढने लगे तो एक ख्यात हिन्दी भाषी इतिहासकार ने जिस तरह उन्हें घूरा और हतोत्साहित किया उसे वर्मा 'जीवन में न भूलने वाला अनुभव' मानते हैं. दरअसल, हिन्दी पर हमला कई तरह से किया जाता है. इस मुद्दे पर इस देश के एलिट समुदाय में अद्भुत एका है. हिन्दी में लिखे लेखों और पुस्तकों को दर्ज ही नहीं किया जाता. इस बार इंडियन हिस्टॉरिकल इंसटीच्यूट के मुंबई वार्षिक अधिवेशन में अर्चना ढेरे (जो मराठी साहित्य की प्राध्यापिका हैं ) ने एक अविस्मरणीय बीज वक्तव्य हिन्दी में दिया. यह तय मानिए कि इस वक्तव्य को हिन्दी में दिए जाने के कारण कभी भी प्रमुखता से कहीं भी छापा नहीं जाएगा. संभव है इस तरह के वक्तव्य हिन्दी में देने वाले लोग अपवाद के रूप में भी न दिखें. अंग्रेजी एलिट में हिन्दी के विरूद्ध जो एका है उसे समझकर हिन्दी भाषी बौद्धिकों ने तैयारी करने की सख्त जरूरत है. यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में हर भाषा के सम्मान के लिए सबसे ज्यादा तत्पर उस समाज के उदार लोग नहीं हैं. ये उन्नत सोच वाले उदार लोग अंग्रेजी के साथ हैं.
शिक्षा और राजकाज के अतिरिक्त जो इलाका अंग्रेजी की दखल में चला जा रहा है वह इस दौर के सांस्कृतिक संकट को सबसे अच्छी तरह से स्पष्ट करता है. वह क्षेत्र है मनोरंजन का. इस देश में हिन्दी फिल्म और क्रिकेट बहुत लोकप्रिय है. इन दोनों क्षेत्रों में अंग्रेजी ने चोर दरवाजे से अपना वर्चस्व बनाया है. हिन्दी फिल्म का लगभग हर शख्स फिल्म के अलावा बाकी सब जगहों पर अंग्रेजी में बोलता है या बोलना चाहता है. सिर्फ बंगाल में आनंद बाजार ग्रुप की नीतियों के कारण फिल्म जगत के लोग बांग्ला भाषी जनता के लिए हिन्दी में बोलते हैं ! लता मंगेशकर, आशा भौंसले आदि कुछ गायकों को छोडकर कोई छोटी बडी फिल्मी हस्ती हिन्दी में बोलती दिखाई नहीं देती. क्रिकेट की कमेंट्री अब अंग्रेजी में ही होती है. भला हो दूरदर्शन की पुरानी नीतियों का कि एक कोने में एक टी वी दे दिया जाता है जिसे देखकर सुशील दोषी जैसे हिन्दी के यशस्वी कमेंट्रेटर हिन्दी में कमेंट्री करते हैं. यह बात गौर करने की है कि आज भी सुशील दोषी साफ सुथरी हिन्दी में बेहतरीन कमेंट्री करते हैं. हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए. जिन लोगों ने हिन्दी में कमेंट्री की शुरूआत की थी, मसलन अरूण लाल, मोहिन्दर अमरनाथ, मनिंदर सिंह आदि वे सब अब अंग्रेजी में कमेंट्री करने लगे. कपिलदेव जैसे लोग हिंदी कमेंट्री के लिए तैयार नहीं. वे अंग्रेजी कमेंट्री करना चाहते है जिसके लिए चैनल वाले तैयार नही ! हम सब मिलकर अब नहीं चेते और इस तरह के तर्क देते रहे कि बाज़ार तो हिन्दी के साथ है और भले ही अंग्रेजी में बोला जाता हो लेकिन अर्थ ग्रहण हिन्दी में होता है, हम भूल कर रहे हैं. खतरा यहां तक बढ गया है कि हिन्दी के लोग भी अंग्रेजी शैली में सोचने विचारने के अभ्यस्त होने लगे हैं, अपनी हिन्दी छवि को छुपाने लगे हैं. जो लोग हिन्दी के अध्यापक हैं वे जब अंग्रेजी में या अंग्रेजीनुमा हिन्दी में बोलने दिखने की होड में दिखते हैं तो उन तमाम नौजवानों को बेहद निराशा होती है जो इस संकट के दौर में भी अपनी भाषा में काम करना चाहते हैं. हिन्दी समाज के प्रबुद्ध लोगों को इस दिशा में काम करने की संभावनाओं को बढाने की कोशिश करनी चाहिए. तभी वह सहज माहौल हम जन माध्यमों में पाएंगे जो हिन्दी के आते ही सहज ही टी वी के पर्दे पर आ जाता है. पर इस सांस्कृतिक माहौल को हम अपनी भाषा के प्रति दायित्वशील होकर ही हासिल कर सकते हैं.

Saturday, 18 December, 2010

मुस्लिम लीग और साम्प्रदायिक राजनीति पर डॉ गिरीश पाण्डेय की पुस्तक का लोकार्पण

मुस्लिम लीग और साम्प्रदायिक राजनीति पर डॉ गिरीश पाण्डेय की इतिहास पुस्तक का लोकार्पण भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ के एन दुबे ने भागलपुर के सुंदरवती महिला कॉलेज में किया. इस अवसर पर बडी संख्या में स्थानीय विद्वान एवं आमंत्रित वक्ता उपस्थित थे. यह एक अत्यंत जरूरी किताब है जिसमें साम्प्रदायिक राजनीति के उन पक्षों पर प्रामाणिक दस्तावेजों की मदद से गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है. डॉ दीपक मलिक ने इसकी भूमिका में इस पुस्तक की गुणवत्ता पर विचार किया है.वे लिखते हैं- " इस पुस्तक में उपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद, उपनिवेशी राज्य और साम्प्रदायिकता के जटिल अंतर्संपर्कों की गहन पडताल की है."
मित्र गण इस पुस्तक को पढकर हिंदी में ऐसी पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रसन्न होंगे.

Sunday, 3 October, 2010

Bihar ke yashashvi patrakar

बिहार की पत्रकारिता के गौरव क्रूपाकरण



बिहार से एक हजार किलोमीटर से ज्यादा दूर पांडिचेरी में जन्मे पी॰के॰ क्रूपाकरण (पांडिचेरी कनक सभापति क्रूपाकरण) ने बिहार और बिहार की पत्रकारिता को अपनी जिंदगी क्यों दे दी? एक तमिल भाषी, अंग्रेजी पत्रकार ने क्यों बिहार की धरती, बिहार की भाषा, बिहार की संस्कृति को इतनी तरजीह दी? बिहार के बौद्धिक परिवेश में उनके जाने के बाद उनके व्यक्तित्व पर बहस-विमर्श का एक दौर शुरू हो गया है। पिछले दिनों, बिहार के सबसे ज्यादा जाग्रत विचार केन्द्र गाँधी संग्रहालय में बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन और गाँधी संग्रहालय के संयुक्त तत्वाधान में क्रूपाकरण स्मृति गोष्ठी का आयोजन किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बी॰बी॰सी॰ लंदन के बिहार प्रमुख पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने बताया कि उन्होंने किस तरह ठोक-ठोक कर मुझे प्रोपीपुल रिर्पोटिंग की शिक्षा दी। वे कहते थे-प्रोपीपुल रिपोर्टिंग से रिपोर्ट में जान आ जाती है। मैं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा रहा था। क्रूपाकरण जी ने रास्ते में इस तरह मुझे उत्साहित कर दिया कि जब मैंने इंदिरा जी से एक कड़ा सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने उस सवाल का सही जवाब तो नहीं दिया पर सवालकर्ता को चुप करने के लिए मेरे बारे में ऐसी टिप्पणी कर दी कि सबको हँसने के लिए मजबूर कर दिया। आज मैं क्रूपाकरण जी को अपने जीवन का संबल और बिहार की पत्रकारिता का एक शिखर पत्रकार मानता हूँ।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर नवल किशोर चैधरी ने कहा कि जे॰पी॰ आंदोलन में इंडियन एक्सप्रेस की बड़ी भूमिका थी। उस समय बहस के केन्द्र में अखबार की खबरें रहती थीं। जिस आंदोलन के लैंडमार्क जे॰पी॰ थे, उस आंदोलन को ताकतवर बनाने में क्रूपाकरण जी जैसे पत्रकार की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी। क्रूपाकरण जी के बारे में विश्वविद्यालयों और पत्रकारिता संस्थानों में अध्ययनरत युवा पत्रकारों को जानने की जरूरत है।
दो दशक तक विधान पार्षद रहे समाजवादी नेता और क्रूपाकरण जी के घनिष्ठ मित्र इंद्र कुमार ने कहा कि जे॰पी॰ आंदोलन की गर्भ से निकले नेता लोग टिकट बांटने-मांगने में इतने व्यस्त हैं कि क्रूपाकरण जी को भूल गये, ऐसे नेताओं का पत्रकार बिरादरी बहिष्कार करे। इंद्रकुमार ने क्रूपाकरण जी की याद में डाक बंगला चैराहा के पास विद्यालय उपनिरीक्षिका परिसर के पुराने परिसर में सरकारी सौजन्य से काफी हाउस शुरू करने की माँग की। वरिष्ठ अंगे्रजी पत्रकार और ‘द मेसेनिक टाइम’ के लेखक अभय सिंह ने क्रूपाकरण जी को अपनी पत्रकारिता का एक आइकान बताया।
गाँधीवादी डा॰ रजी अहमद ने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस, इमरजेंसी, जे॰पी॰ और क्रूपाकरण एक दूसरे के पूरक हो गये हैं। जिस टेलीप्रिंटर से क्रूपाकरण जी समाचार भेजते थे, वही टेलीप्रिंटर आंदोलन के बारे में देश भर से सूचना प्राप्त करने का माध्यम था। क्रूपाकरण जी सर्चलाईट के पत्रकार मास्टर साहब की बराबर चर्चा किया करते थे कि किस तरह मास्टर साहब बांस घाट पर अपनी पत्नी की जलती हुई चिता छोड़कर साईकिल से खबर भेजने दफ्तर आ गये थे। उस समय मंटू घोष, आजाद साहब, मास्टर साहब, क्रूपाकरण जैसे पत्रकारों की एक पीढ़ी थी, जिनके बारे में जानना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है।
जे॰पी॰ आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन ने कहा- समाचारों से संघर्ष की जो धारा बनती है, क्रूपाकरण जी उस धारा के नायक थे। उन्होंने राजनीति और नैतिकता से जुड़े कुछ ऐसे सवाल मुझसे पूछ लिये थे, जो जीवन में किसी दूसरे ने कभी नहीं पूछे। ऐसा कहते हुए हुसैन रो पड़े।
युवा पत्रकार इमरान ने सिर्फ एक बार की मुलाकात का जिक्र करते हुये बताया कि उन्होंने कहा था- पत्रकारिता फार या एगेंस्ट नहीं होती है। पत्रकारिता अंततः सत्य ही होती है। नयी पीढ़ी को उत्साहित करने के लिए क्रूपाकरण स्मृति पत्रकारिता आवार्ड की शुरुआत होनी चाहिए।
नन्दीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज ने कहा कि तमिल, तेलुगू, मलयालम, बांग्ला, उर्दू, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी सहित आठ भाषाओं के ज्ञाता क्रूपाकरण को बिहार की पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव अरुण कुमार ने कहा कि यूनियनों के अवसान का यह काल बुरे दौर से गुजर रहा है। ऐसे में यूनियन को नया जीवन दिलाने के लिए हम क्रूपाकरण जी को याद कर रहे हैं। गोष्ठी में एस॰यू॰सी॰आई॰ केन्द्रीय कमिटि सदस्य अरूण सिंह, पत्रकार अमित कुमार, रंगकर्मी अनीश अंकुर सहित शहर के कई गणमान्य बुद्धिजीवी शरीक थे।

(Mediamorcha se sabhar)

Friday, 17 September, 2010

रवींद्रनाथ की देश-चिंता

रवींद्रनाथ की देश-चिंता ; कुछ प्रसंग
हितेन्द्र पटेल एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, रवींद्र भारती
विश्वविद्यालय, कोलकाता.


रवींद्रनाथ ठाकुर को इस देश में आधुनिक समय के सबसे विख्यात संस्कृति
पुरूष के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है. लगभग सभी भारतीय भाषाओं के
लेखकों- पाठकों ने उन्हें सम्मान दिया है. गाँधी के बाद सबसे अधिक उन्हीं
के नाम से विभिन्न सरकारी और सार्वजनिक स्थलों के नाम भी रखे गये हैं.
ऐसी अनेक कविताएं और लेख भारत की विभिन्न भाषाओं में मिल जाते हैं जिसके
आधार पर यह कहना अनुचित न होगा कि पूरे भारत के साहित्यकारों ने पाठकों
को अपना कवि माना है. वे बंग्ला के कवि भले ही हों वे सही अर्थों में
पूरे आधुनिक भारतीय साहित्य के सबसे महान प्रतिनिधि माने गये हैं. नेहरू
का यह कथन कि उनके दो गुरू हैं- गांधी और रवींद्रनाथ इस बात के प्रमाण
हैं कि उन्हें सिर्फ साहित्यिक नहीं एक सांस्कृतिक पुरूष के रूप में
सम्मान दिया गया है.
इन सब बातों के आधार पर यह मान लिया जाना युक्ति-संगत नहीं होगा कि उनकी
सच्ची विरासत को लोगों के सामने उचित ढंग से रखा गया है. अधिकतर जगहों पर
उनके नाम का प्रयोग तो बहुत मिलता है लेकिन उनके विचारों के प्रति गहरा
सरोकार नहीं दिखता. आज वैश्वीकरण के युग में उन्हें ठीक से कितना पढते
हैं इसके बारे में बहुत उत्साह वर्द्धक टिप्पणी करना मुश्किल ही होगा. यह
कहना शायद ठीक होगा कि गाँधी की तरह उनके नाम का प्रयोग तो बहुत अधिक हुआ
है लेकिन उनके सरोकारों और उनके संघर्षों को भुला दिया गया. इस आलेख में
कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया गया है जिससे रवीन्द्रनाथ की सच्ची विरासत
को समझने में मदद मिल सके.
यह भ्रामक है कि रवीन्द्रनाथ अपने देश में अपने जीवन काल में सर्वप्रिय
थे. खुद उन्हीं के शब्दों में देखें. अपने एक लेख में वह कहते हैं -"
मेरे साहित्य के प्रति बहुत दिनों तक एक विरोध बना रहा. कुछ लोगों को
लगता था कि मेरी कविताएँ राष्ट्रीय हृदय से नहीं निकली हैं; कुछ लोगों ने
इसे समझ में नहीं आने वाली बतलाया और कइयों ने इन्हें अ-पूर्ण माना.
वास्तव में, मुझे अपने लोगों ने कभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं
किया...". एक विद्वान ने एक दिलचस्प टिप्पणी की है जिसे ध्यान में रखा जा
सकता है. उनका एक सीधा सा प्रश्न था - रवीन्द्रनाथ अपनी उम्र के ही
विवेकानंद के साथ ही बडे हुए थे. दोनों के बीच के संबंध ऐसे थे कि लडकपन
में जब रवीन्द्रनाथ गाते थे तो विवेकानंद पखावज बजाते थे. दोनों के घर के
बीच आधा किलोमीटर से अधिक की भी दूरी नहीं थी. फिर उन दोनों महानों ने एक
दूसरे के बारे में इतना कम क्यों कहा. रवीन्द्रनाथ के एक-आध लेखों के
अलावा ज्यादा कुछ हमें नहीं मिलता. ऐसा क्यों था? इसके उत्तर में एक
सामान्य उत्तर होगा कि रवीन्द्रनाथ का परिवार ब्राह्म समाज का प्रचारक था
और विवेकानंद सनातनी वेदांती धारा के लोगों के साथ थे. पर यह व्याख्या
यथेष्ट नहीं. बंकिमचन्द्र भी हिंदूवादी मतादर्श के ही थे लेकिन उनके
प्रति रवीन्द्रनाथ ने बहुत ही आदर से लिखा. एक बार बंकिम की युवा
रवीन्द्रनाथ को फटकार ने भी रवीन्द्रनाथ के मन में बंकिम के प्रति आदर को
कम नहीं किया.
अपने एक प्रसिद्ध लेख 'कलाकार का धर्म' में रवीन्द्रनाथ ने उन्नीसवीं
शताब्दी के तीन आन्दोलनों को केन्द्रीय माना है. उनके अनुसार इन तीन
आंदोलनों ने बंगाल और पूरे देश को प्रभावित किया. ये आंदोलन थे- राजा
राममोहन राय द्वारा शुरू किया गया धार्मिक आन्दोलन, बंकिमचन्द्र
चट्टोपाध्याय द्वारा शुरू किया गया साहित्यिक आन्दोलन (जिसने अपने जादुई
छडी से सदियों से सोई हुई बंग्ला भाषा को जगा दिया) और राष्ट्रीय आंदोलन.
आमतौर पर रवींद्रनाथ को राष्ट्रवाद का विरोधी समझा जाता है लेकिन यह सही
नहीं है. यह सही है कि स्वदेशी आंदोलन के बाद उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद
का विरोध किया था और अपने को स्वदेशी आंदोलन से एक तरह से अलग किया था.
अपने उपन्यासों में- खासकर घरे बाइरे में वे इसी रूझान को स्पष्ट करते
भी है. लेकिन वे राष्ट्रवादी आंदोलन को प्रतिक्रियावादी न मानकर
क्रांतिकारी मानते हैं जिसने अपने देश के इतिहास में देश के लोगों का
विश्वास पैदा किया और इस भ्रम को तोडा कि यूरोप की नकल में कोई मान है.
यह सब उसी लेख में स्पष्टत: लिखा है जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है.
रवीन्द्रनाथ के साहित्य के अध्ययन की एक समस्या यह रही है कि वे गाँधी की
तर्ह भाषा के भीतर गहरे अर्थों को लेकर चलते थे जिसके आधार पर उनकी बातों
के निहितार्थ को समझने के लिए उनके साहित्य में गहरे उतरना पडता है. थोडी
सी असावधानी से उनके साहित्य के भीतर से उल्टा अर्थ भी निकाला जा सकता
है. 'नेशनलिज्म' पर 1917 में लिखी उनकी पुस्तक के आधार पर बहुत सारे
विद्वान उन्हें राष्ट्रवादी न मानकर अंतर्राष्ट्रीय मनोभाव का कवि-विचारक
मानते हैं, लेकिन यह उनके विचारों का एक अधूरा पाठ है. रवींद्रनाथ हमेशा
अपने देश की संस्कृति, इतिहास और परंपरा को एक भारतीय दृष्टि से देखते
थे. इस भारतीय दृष्टि का एक नमूना वह लेख है जिसमें वे सभ्यता पर विचार
करते हैं. अपने एक लेख में कहा है कि उनके लिए यूरोप से आयातित
'सिविलाइजेशन' शब्द के लिए भारत में जो सबसे उपयुक्त शब्द है वह है धर्म.
यह धर्म उनके लिए कोई संगठित धर्म नहीं बल्कि वे मूल्य हैं जिसे व्यक्ति
अपने जीवन में लेकर चलता है. इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक
सुंदर उदाहरण दिया है. अपने एक अनुभव का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि
एक बार कलकत्ता आते हुए रास्ते में उनकी मोटर में खराबी आ गयी और उसे फिर
से चलाने के लिए बार बार पानी की जरूरत थी. कुल सौ किलोमीटर की यात्रा
में कई बार गरीब लोगों ने उन्हें बहुत परिश्रम से पानी लाकर पानी दिया.
उसके बदले में किसी भी गरीब ने पैसे लेने से इंकार कर दिया. हालाँकि उन
गरीबों को पैसे की बहुत जरूरत थी. इस यात्रा में जब गाडी कोलकाता के
नज़दीक पहुंची जहाँ पानी देना सुलभ था वहाँ इसके बदले में आदमी ने पैसे
माँगे. रवींद्रनाथ ने लिखा है कि अगर गरीब लोग पानी का व्यवसाय करते तो
उनको बहुत फायदा होता लेकिन किसी प्यासे को पानी पिलाना या जरूरत-मंद को
पानी देकर या खाना खिलाकर उसके बदले पैसे लेना ये गरीब धर्म के विरूद्ध
समझते हैं. इन लोगों की दुनियावी जरूरत और उनके धर्म के बीच के इस संबंध
को रखते हुए रवींद्रनाथ कुछ टिप्पणियाँ करते है. वे कहते हैं कि जीवन के
सहज रूप में जो मूल्य लोग अपने भीतर लिए हुए चलते है (इसके लिए 'सस्टेन'
शब्द का प्रयोग किया गया है) उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है. इस धर्म के बोध
को ही रवींद्रनाथ सभ्यता कहते हैं. (देखें- उनका प्रसिद्ध लेख-
'सिविलाइजेशन एंड प्रोग्रेस', बाउंडलेस स्काई, कोलकाता, 1964,
पुनर्मुद्रित 2006).
आशिस नंदी ने अपनी पुस्तक राष्ट्रवाद बनाम देशभक्ति में लिखा है कि
रवींद्रनाथ को डर था कि भारतीय राष्ट्र का विचार कहीं भारतीय सभ्यता पर
प्राथमिकता न प्राप्त कर ले. वे नहीं चाहते थे कि भारतवासियों की जीवन
शैलियों का आकलन केवल भारत नामक राष्ट्र-राज्य की कसौटियों पर हो. नंदी
दिखलाते हैं कि कैसे रवींद्रनाथ राष्ट्रवादी विचारधारा से असहमत होते चले
गये. उनके अनुसार रवींद्रनाथ राष्ट्रभक्ति नहीं देशभक्ति को आधार बना कर
चले थे. उनके जीवन में नंदी अलग अलग समय पर तीन तरह की प्रवृत्तियों की
चर्चा करते हैं. उनके अनुसार रवींद्रनाथ युवावस्था में हिंदू राष्ट्रवाद
से प्रभावित थे, वयस्क होने पर वे ब्राह्मणवादी-उदार-मानवतावाद से
प्रभावित हुए और जीवन के अंतिम वर्षों में राज्य-विरोधी होने तक पहुंच
गये. यह स्थापना रवींद्रनाथ को एक ऐसे विचारक के रूप में प्रस्तुत करती
है जो निरंतर अपने विचारों को अपने जीवनानुभवों और सभ्यता-विवेक से
परिष्कृत करने वाले विचारक के रूप में प्रस्तुत करता है. एक दार्शनिक ने
गाँधी के सन्दर्भ में उनके युग-धर्म के पालन को केन्द्रीय महत्त्व दिया
है. अगर रवींद्रनाथ के संदर्भ में किसी चीज को केन्द्र में रखकर देखने के
लिए उनके सभ्यता विवेक को प्रस्तावित किया जाये तो शायद गलत नहीं होगा.
यह उनका सभ्यता-विवेक ही था जो उन्हें राष्ट्रवाद के खिलाफ खडे होने की
शक्ति प्रदान करता था. यह सर्वविदित है कि जब बंगाल का विभाजन हुआ और
बंगाल के बुद्धिजीवी कर्जन की बंगाल को बाँटकर राष्ट्रवादी शक्तियों को
कमजोर करने के इस प्रयास का विरोध शुरू हुआ रवींद्रनाथ ने इस आंदोलन की
अगुवाई की थी. उनका गीत 'आमार सोनार बांग्ला' उस समय आंदोलन का गीत बन
गया था. लेकिन, रवींद्रनाथ ने स्वदेशी आंदोलन के दौरान के अपने अनुभवों
और भारतीय सभ्यता के प्रति अपनी दृष्टि के कारण यह देख लिया कि इस
विचारधारा में क्या दोष है. वे पश्चिमी इतिहास पर आधारित राष्ट्रवाद की
अवधारणा को भारतीय संदर्भ में दोषयुक्त मानते थे. इसी कारण से वे
गरमपंथियों के आदर्शों से सहमत नहीं थे. उनके इस कथन पर ध्यान दिया जाना
चाहिए- " जिन लोगों को उनकी राजनीतिक आजादी मिल गयी है, वे जरूरी नहीं कि
आजाद ही हों. वे तो केवल ताकतवर भर हैं. उनका बेलगाम आवेश स्वाधीनता के
धोखे में गुलामी को बढावा दे रहा है." (नेशनलिज्म , 1917, पुनर्मुद्रण,
मद्रास: मैकमिलन, 1985, पृ. 68. यह अनुवाद अभय कुमार दुबे का है) यह
रवींद्रनाथ के विचार का वह महत्त्वपूर्ण बिन्दु है जहाँ वह भारतीय
राष्ट्रवाद की उस निर्मिति के विरूद्ध खडे होने का जोखिम उठाते है जिसे
आकार देने में दयानंद, विवेकानंद, अरविंद घोष और तिलक जैसे लोगों का
योगदान था. इस निर्मिति को रवींद्रनाथ अस्वीकार करते हैं. उन्हें लगता है
कि भारत के शिक्षित लोग " अपने पूर्वजों द्वारा दी गयी नसीहतों के विपरीत
इतिहास से कुछ सबक लेने की कोशिश कर रहे हैं."(नेशनलिज्म, पृ. 64)
समकालीन इतिहास के इस दबाव के सामने खडे होने के रवींद्रनाथ के इस साहस
की प्रशंसा करनी पडती है. जब राष्ट्रवाद का जोर बढ रहा हो उनमें यह विवेक
था कि वे पूछ सकें- " क्या वह (भारत) अपनी विरासत बेच कर की गई कमाई के
बदले समकालीन इतिहास की चमक-दमक भरी क्षणभंगुर निर्मितियों को खरीदेगा?"
रवींद्रनाथ के लिए भारत की असली समस्या सामाजिक है, राजनैतिक नहीं. वे
मानते थे कि भारत में राष्ट्रवाद वास्तविक अर्थ में कभी था ही नहीं. वे
30 दिसंबर 1916 को कहते हैं कि " आज हमारे देश के लोग पुरखों की दी हुई
शिक्षा के विपरीत जा रहे हैं. पूरब आज इतिहास का वह पाठ पढ रहा है" जो
उसके अपने सांस्कृतिक अनुभवों से नहीं "जन्मा है". वे जापान की तरक्की को
भी नकली मानते हैं और कहते हैं कि उसने अपने को "भीतर से विकसित नहीं
किया है." (इस महत्त्वपूर्ण वक्तव्य के लिए देखें 'नेशनलिज्म इन इंडिया'
(संक्षिप्त), 30 दिसंबर , 1916, प्रमोद शाह संकलित एवं संपादित थॉट्स ऑन
रिलिजियस पॉलिटिक्स इन इंडिया वॉल्यूम 1, कोलकाता, 2009, पृ. 283-88).
रवींद्रनाथ जिस ओर 1916 के बाद लगातार बढ रहे थे वह था मानवतावाद की एक
वैश्विक समझ. अपने उसी वक्तव्य में वे कहते हैं कि दुनिया में सिर्फ मानव
का इतिहास है और सभी देशों का इतिहास उस इतिहास के छोटे-छोटे अध्याय भर
हैं. हीरेन मुखर्जी ने 'रवींद्रनाथ और उनकी मानवतावाद की धारणा' नामक
आलेख में महान कवि के भीतर के मानवतावाद की व्याख्या सरल शब्दों में की
है जिसमें मनुष्य के भीतर प्रेरणा के उत्स को समझने के कवि प्रयास की
अभिव्यक्ति हुई है. मुखर्जी के अनुसार रवींद्रनाथ मानते थे कि हर मनुष्य
के भीतर मानव और महामानव दोनों का वास होता है. व्यक्ति मानव की
अभिव्यक्ति है और जाति उसी व्यक्ति के भीतर के महामानवोचित अंश की
अभिव्यक्ति है. व्यक्ति नश्वर है और जाति अमर. जाति व्यक्तियों का कुल
योग नहीं है. अकस्मात व्यक्ति अपने भीतर इस महामानव के सत्य का दर्शन
करता है और उस सत्य के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करता.
रवींद्रनाथ के शब्दों में - " एक व्यापक चित्त है जो व्यक्तिगत नहीं,
विश्वगत है, जिसका परिचय अकस्मात होता है. एक दिन आह्वान आता है, अकस्मात
मानुष-सत्य के लिए प्राण देने के लिए उत्सुक होता हूँ" व्यक्ति जब इस
आह्वान को सुन पाता है तभी वह लोगों को ईश्वर समझ कर उसकी सेवा के लिए
तत्पर हो उठता है. इसी भाव का विस्तार उनके विश्वविद्यालय की परिकल्पना
में है जो विश्व के छंद पर नृत्य करना सिखलाने के लिये वे बनाना चाहते
थे. (देखें- हीरेन मुखर्जी, 'रवींद्रनाथस कॉस्पेशन ऑन
ह्यूमेनिज्म'रवींद्र भारती पत्रिका वॉल्यूम 11, 2008)
सभ्यता और प्रगति के संबंध में रवींद्रनाथ की दृष्टि बहुत ही सूक्ष्म
विश्लेषण की मांग करती हैं. वे पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति और उसकी
समृद्धि के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते. अपने एक लेख 'द
चैलैंजिंग एज' में वे पश्चिम के उस शक्तिशाली बौद्धिक प्रकाश के महत्त्व
को समझाते हैं जिसने दुनिया को जीत लिया. इस आलोक के 'बिजली के झटके' से
कैसे भारत ने समझा कि नैतिकता और न्याय का एक मानवोचित आधार होना चाहिए
जिसमें मानव मानव के भेद को मिटा दिया. कम से कम नैतिक धरातल पर इस देश
ने पहली बार जाना कि जाति चाहे जो हो न्याय और नैतिकता के नियम सबके लिए
एक ही होंगे. इस पश्चिम के आने से ही इस देश में एक आदर्श नैतिक मानदंड
तैयार हो सका. इसके लिए वे पश्चिम की प्रशंसा करते हैं. साथ ही वे लिखते
हैं कि पश्चिमी साहित्य, खासकर अंग्रेज़ी साहित्य के सम्पर्क में आकर
हमलोगों ने न सिर्फ भावना के गहरे संसार को जानना-समझना सीखा बल्कि
मनुष्य को मनुष्य के शोषण से मुक्त करने की भावना का भी विकास किया. अपने
सत्तरवे वर्ष में लिखे इस आलेख में (यानि 1931 ई. में) वे स्पष्ट रूप से
कहते हैं कि यह युग "यूरोप के साथ आंतरिक (इनवार्ड) सहयोग का युग है".
इतना कहने के बाद रवींद्रनाथ उस ओर जाते हैं जहाँ से वे इस पश्चिम के
शक्ति-जनित सभ्यता का दूसरा चेहरा भी दिखलाते है. वे इस पश्चिम के नैतिक
धरातल से गिरने को विश्वयुद्ध से जोडते हैं. वे कहते हैं कि विश्वयुद्ध
के बाद ऐसा लगता है कि यूरोप ने अपनी शुद्धता और सभ्यता का विवेक
('सैनिटी) को खो दिया है. वे एक सूत्र देते हैं जो मानो रवींद्रनाथ का
संदेश हो उन सबके लिए जो समाज में परिवर्त्तन के पक्षधर हैं. वे कहते हैं
कि हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो सबसे शक्तिशाली हैं उनका
दायित्त्व भी सबसे ज्यादा है. उनका अपराध ही सबसे घृणित है. वे यूरोप की
इस शक्तिशाली सभ्यता के पतन को अपरिहार्य मानते हुए भारतवासियों को
प्रगति के यूरोपीय मॉडल को न मानने की सलाह देते हैं. वे कहते हैं कि
उनका हृदय दु:ख से भर उठता है जब वे देखते हैं कि इस देश के पढे-लिखे लोग
बडे, शक्तिशाली, और तेजी वाली चीजों के प्रति आकर्षण देखते हैं. प्रगति
का जो आदर्श आंतरिक आदर्श से नहीं जुडता और हमें अपने दायित्व के प्रति
सचेत नहीं करता. यह हमें अधर्म की ओर ले जाता है. यह अधर्म हमें तेजी से
शक्तिशाली तो बना सकता है जिससे हम शत्रु को परास्त भी कर सकते हैं.
लेकिन, यह हमें भीतर से नष्ट कर देता है. वे कहते हैं - " इस धन और शक्ति
में विनाश के बीज हैं. पश्चिम में इस सम्पत्ति को मानव-रक्त से सींचा गया
है जिसकी फसल अभी लहलहा रही है." वे इस खुशहाल, शक्तिशाली पश्चिम की नकल
को भारत जैसी सभ्यता में जन्मे-पले लोगों द्वारा ललचाई निगाह से देखने को
दुर्भाग्यपूर्ण मानते थे. ईश्वर ने जिसे आंतरिक शक्ति से लबालब, आनंद से
भरपूर, फूल और सितारों के संगीत से भर रखा हो उसे क्या लालच से भरकर उस
रास्ते पर चलना चाहिए जिसमें वस्तु से शून्य (थिंग टू नथिंग) की यात्रा
होती हो?
रवींद्रनाथ का स्मरण उनकी पूजा करते हुए, विनाशकारी पश्चिम की अनैतिकता
फैलाती प्रगति की ओर दौड लगाते हुए करना उस महान सभ्यता विवेक और देशज
नैतिकता-बोध से भरे संस्कृति पुरूष का उपहास करना ही है. आज जरूरत इस बात
की है कि गांधी के साथ हम रवींद्रनाथ की दृष्टि के साथ अपने भीतर के
व्यक्ति और महामानव के बीच से महामानवोचित आदर्श का वरण करें. यही
रवींद्रनाथ को उनके 150वें वर्ष में हमारा संकल्प होना चाहिए. किसी खंडित
दृष्टि को रखकर, जैसा कि कई सम्प्रदायवादी और क्षेत्रवादी विचार सरणियों
से जुडे लोग करते हैं, या सर्वग्रासी प्रगति की ओर अंधाधुंध दौड लगाने
वाले लोग रवींद्रनाथ का नाम तो बहुत लेंगे लेकिन उनके विचारों से उनका
दूर दूर का रिश्ता नहीं होगा. रवींद्रनाथ की दृष्टि की व्यापकता का एक
उदाहरण देकर इस संक्षिप्त आलेख का समापन ठीक होगा.
आज रवींद्रनाथ को बंगाली जातीयता के महानायक बनाकर देखने का चलन है.
अन्नदाशंकर राय ने अपने संस्मरण में रवींद्रनाथ से जुडी एक बात का उल्लेख
किया है. प्रशासनिक परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अन्नदाशंकर रवींद्रनाथ से
मिलने गए और यह बतलाया कि वे चाहते तो भारत के किसी भी भाग में जाकर
नौकरी कर सकते थे लेकिन, अपने बंग-माटी के प्रेम के कारण, उसे और समझने
के लिए उन्होंने इसी राज्य में सेवा करने का निश्चय किया. उन्हें लगा कि
इस बात से प्रसन्न होकर रवींद्रनाथ उनके बंगाल प्रेम को सराहेंगे लेकिन,
हुआ ठीक उल्टा. रवींद्रनाथ ने कहा कि यह ठीक नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि
बंगाल तो उसका घर है इसलिए इसको तो वे कभी भी, देर-सवेर जान ही लेते
लेकिन देश के अन्य भाग को जानने समझने का, अपने देश के दूसरे हिस्से की
सेवा करने का, उससे जुडने का ऐसा मौका उन्हें नहीं चूकना चाहिए था !

Friday, 10 September, 2010

आभासी हिंसा, आरोपित कामन सेंस, सामाजिक की प्लास्टिक सर्जरी और मीडिया (सन्दर्भ ज्याँ बोद्रोया)

आभासी हिंसा, आरोपित कॉमन सेंस और सामाजिक की प्लास्टिक सर्जरी
मीडिया के इमेज जिसमें सबकुछ दिखता है हिंसा के उन इलाकों को लेकर हमारे सामने खडा होता है जिसको देखते हुए हम हिंसा को तैयार करने के विरूद्ध सक्रिय जो मन की कोशिकाएं होती हैं वे स्ववमेय आरपार दिखती है. और दिखता है दिमाग के भीतर का वह केन्द्र जहाँ से हिंसा शुरू होती है. पर्दे की हिंसा हमारे ऊपर कोई आघात नहीं लाती, हम खून करते हुए, तडपते हुए आदमी को देखते हुए आराम से कोल्ड ड्रिंक्स पीते रह सकते हैं. यह हिंसा के आघात से हमारे मन को मुक्त रखते हुए हमें हिंसा को देखते झेलते रहने की उदासीनता प्रदान करता है. मैकलुहान ने लक्षित किया था कि माध्यम ही संदेश हो जाता है. मीडिया ने धीरे धीरे संदेश को गैर-जरूरी और कम महत्त्वपूर्ण बना दिया. इस अर्थ में पर्दे की हिंसा ही संदेश बन जाती है. हिंसा की सूचना से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है यह कि इसे कैसे पेश किया जा रहा है. जैसे संगीत की गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी पर्दे पर यह हो गया है कि किस भव्यता से उस संगीत को पेश किया जा रहा है. बॉद्रिया ने संदेश और माध्यम के इस टकराहट से उत्पन्न कटुता या विषाक्तता (वरुलेंस) को हिंसा से भी अधिक खतरनाक मानते हैं. एक सीधी हिंसा में एक निदान होता है: एक ने दूसरे को किसी दुश्मनी के कारण मार डाला और मामला एक निर्णय पर पहुंच गया. लेकिन, अब इस तरह नहीं होता. अब निदान नहीं है. कोई किसी को दिन-दहाडे मारकर भी फाँसी पर नहीं लटक रहा. अगर वह फाँसी पर लटक जाए तो बात एक किनारे लग गई- हिंसा हुई और हिंसा करने वाले को दण्ड मिल गया. अब महीनों तक लोगों को बताया जाता रहेगा कि उसका वजन बढ रहा है, वह झूठ बोल रहा है, पाकिस्तानी वकील और सरकार क्या क्या कर रही है, वह अमिताभ बच्चन की फिल्में रोज देखता है, ज्यादा टेंशन में आने पर गाना गाने लगता है आदि आदि. इस तरह एक हिंसक घटना को लेकर सीधी और सच्ची रिपोर्टिंग के भीतर से ही वह वातावरण बनता है जहाँ करोडों भारतीय सप्रमाण इस तरह की बातों पर सोचते और बहसें करते हैं कि मुसलमान कितने देशद्रोही हैं, पाकिस्तान कैसे सिर्फ आतंकवादियों का देश है, भारतीय सरकार मुसलमानों के प्रति कितनी नरम है या दरअसल अमरीका की अनुमति के बिना भारत की कानून व्यवस्था कसब को फाँसी नहीं सुना सकती. और फिर लोग अनुमान करते रहते हैं कि कसब कब फाँसी पर चढाया जाएगा. आप यकीन कीजिए जब तक कसब को फाँसी होगी तब तक उसको फाँसी देने की बात का कोई मतलब रह ही नहीं जाएगा. रश्मी तौर पर मीडिया में यह खबर होगी कि आखिरकार दरिंदे को उसकी दरिंदगी की सजा मिल गई. फिर एक सवाल छोडा जाएगा- क्या आपको लगता है कि भारत की कानून व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किए जाएं ताकि इस तरह के केसेज को उसकी परिणति तक पहुंचाने में इतना विलंब न हो!
इस संदर्भ में बोद्रिया का कथन है कि इस मीडिया की सीधी और सच्ची रिपोर्टिंग के बीच "यथार्थ का खून" हो जाता है. छवियों के असीमित जगत में सत्य के इस सतत प्रवाह का, सत्य के, निष्कर्ष के सतत फिसलते जाने के इस खेल में कितना आनंद और कैसा रहस्य है! कैनेडी को किसने मारा? क्यों मारा? इस रहस्य के इर्द गिर्द जो मीडिया जगत में सूचनाओं का अंबार लगा है और यह अभी भी चल रहा है उसकी तुलना में इंदिरा गांधी हत्याकांड के बारे में बहुत कम लिखा पढा गया . बोद्रिया यह भी बतलाते हैं कि इस प्रक्रिया में जो यथार्थ की दुनिया है वह नीरस, बेरंग और बेढब हो जाती हैं और लोग बाजार द्वारा चालित छवियों की दुनिया में चमत्कारिक, जादुई और तिलिस्मी छवियाँ ज्यादा प्रभावशाली होती जा रही है.
जो कुछ टी वी पर दिखलाया जाता है उसकी सामाजिकता के रूप को उद्घाटित करते हुए बोद्रिया का मानना है कि यह आभासी सामाजिकता का पर्दे पर निर्माण जिन छवियों को रचता है उसमें सबकुछ रच कर इस तरह परोस दिया जाता है कि सब कुछ सामने दिखला दिया जाए. किस तरह हवाई जहाज आया, किस तरफ से टक्कर लगी, कैसे लोग चीखे, कैसे भागे... . इन अनंत छवियों के सच के बीच दो सच को रखा जाए. प्रथम, कितने लोग मरे थे 9/11 के इस भयानक आक्रमण में? दूसरा प्रश्न , उस जहाज का सच क्या था जिसे व्हाइट हाउस के आदेश पर उडा दिया गया जिसमें 259 लोग सवार थे? यह जहाज व्हाइट हाउस की ओर बढ रहा था और स्पष्टत: यह व्हाइट हाउस को भी उडाने के लिए टकराने वाला था. पहले प्रश्न का उत्तर हर कोई देगा- बहुत सारे लोग . पर कितने? किसी को ठीक से पता नहीं. एक व्यक्ति ने बी बी सी पर अपने इंटरव्यू में बताया था कि कुल मृतकों की संख्या हजार से कम थी और उसके पास एक लिस्ट थी. उसने चुनौती दी कि कोई नया नाम नहीं जोड सकता. किसी के पास उस चुनौती का कोई उत्तर नहीं था. यानि कुल मृतकों की संख्या हजार से कम थी. दूसरे प्रश्न का उत्तर इस बात में निहित है कि किसी ने भी इसपर कभी भी कोई रिपोर्ट शायद ही पढी देखी हो (भारत में) जिसमें उस जहाज के लोगों के परिवार वालों के दर्द को दिखलाया गया हो.
मीडिया का एक और काम है जिसे बोद्रिया 'सिंथिटिक इमेज ऑव द बनालिटी' कहते हैं. आप सारे दिन करवा चौथ, पूजा पाठ, प्रलय की खबरें, श्री लंका में रावण की गुफा से सीधा प्रसारण, मौसम की पहली बारिश में भीगते झूमते दिल्ली वासी को देखते हुए बरसों बिता देते हैं. बोद्रिया इस सन्दर्भ को एक रोचक ट्विस्ट देते हुए सवाल करते है- क्या कोई सिक्सुअल व्यॉरिज्म भी है क्या? इसका उत्तर देते है कि कोई सेक्सुअल सीनरी है ही नही! वे सेक्स के खुले और सीधे दिखाए जाने में सेक्स के अंत की भी बात करते है. वे अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि रोज की बेहूदा घिसी पिटी जिंदगी को देखने और दिखलाने के इस मीडियाई खेल में अंतत: दर्शक अपने को सबकुछ देख चुकने के बाद कुछ नहीं कह पाने की सी मन:स्थिति में पाता है. इसे वे "ज़ीरो डिग्री" जीना कहते हैं, रोलाँ बार्थ के "ज़ीरो डिग्री लेखन" की तर्ज पर!
भारतीय मीडिया पर यह कितनी दिलचस्प टिप्पणी है कि 'इंडिया टीवी' की दर्शक संख्या इस समय सबसे ज़्यादा है.

पराजय के इस दौर में (सबलोग, जून 2010)

पराजय के इस दौर में
हितेन्द्र पटेल

भारतीय समाज इतना वैविध्यपूर्ण और जटिल है कि इसे सांख्यिकीय आधार पर नहीं समझा जा सकता. पर, अगर नीयत साफ हो तो इस समाज में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक विषमता और इस समाज की आंतरिक शक्ति को समझने के लिए साक्षात्कार ही काफी है. गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे मनीषियों ने इस समाज को समझने और इसमें परिवर्तन हेतु कभी भी सरकारी सर्वेक्षण और रिपोर्टों की जरूरत महसूस नहीं की. विवेकानंद , गाँधी, जयप्रकाश, विनोबा आदि लोगों के लिए देश को जानने समझने के लिए लोगों से देशाटन के दौरान मिलना ही यथेष्ट था. यह आधुनिक यूरोपीय बोध से जन्मा कॉमन सेंस है कि संख्या और सांख्यिकी से ही समाज को समझा और उसकी प्रगति के लिए सरकारी नीति बनायी जा सकती है. नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह या निलकेनी तक संख्या और सांख्यिकी की इस सत्ता और औचित्य को लेकर सहमति है. इस लॉजिक को मान लेने के बाद सब कुछ संख्या-बल और राजनीति पर ही केन्द्रित हो सकती थी और वही बात आज भारत में हो रही है. यह एक दिलचस्प बात है कि जिस आधार पर भारतीय राष्ट्रवाद की 'खोज' या प्रतिष्ठा हुई थी उसी को नकारने के लिए आज होड मची हुई है. राष्ट्रवाद को लेकर कांग्रेस के भीतर भी एक गुणात्मक परिवर्तन हुआ है. 2001 में जब जाति के आधार पर गणना की बात चली तो इस दल ने विरोध किया. अब 2011 में अन्य दलों के साथ कांग्रेस भी इस पक्ष में हो गई है कि जाति के आधार पर जनगणना जरूरी है! यानि पिछले दस सालों में ऐसा कुछ हुआ है जिसके कारण यह बात मान ली गयी कि जाति की गणना सरकारी नीति निर्धारण के लिए आवश्यक है. यानि वर्ग नहीं वर्ण के आधार पर भारतीय समाज को समझा जा सकता है. यह बात भारतीय राजनीति में लोहिया ने अपने जीवन के अंतिम दशक में राजनैतिक दबाव के कारण प्रतिष्ठित की. (उनके चिंतन में इस विषय पर मौलिक और विषद चिंतन है जिसमें लोग उतरना नहीं चाहते) लेकिन, इस बात को वास्तविक रूप से पिछले दो दशकों में बहुत भोंडे ढंग से प्रचारित किया गया. जाति अब राजनीति का धर्म के साथ एक मान्य अस्त्र बन गया. कोई भी पार्टी अब इस बात के ऊपर नहीं उठ सकती. ऐसे में सबको लग रहा है कि जाति के आधार पर जनगणना से बात साफ हो जाएगी और सरकार को नीति निर्धारण के लिए एक स्पष्ट आधार मिल जाएगा. कुछ सवर्ण दल और राष्ट्रवादी विचार के लोग इसका विरोध नीतिगत कारणों से कर रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर देश में यह बात स्वीकृत सी हो गई है कि जातियों के संख्या निर्धारण में कोई हर्ज़ नहीं है. यह आधुनिक इतिहास की एक विडंबना ही कही जायेगी कि जाति को मिटाते मिटाते देश की सरकार के नीति निर्धारक आधार के रूप में जाति को स्वीकार कर लिया गया है! आज समय आ चुका है जब लोग गाँधी को बनिया, रवीन्द्रनाथ को ब्राह्मो -ब्राह्मण, जयप्रकाश को कायस्थ, सहजानंद को भूमिहार, अंबेडकर को महार कहकर सोचें कि इसमें बुराई क्या है! इस तरह की सोच अब और शक्तिशाली होने वाले हैं. यह औपनिवेशिक आधुनिक यूरोपीय सोच की जीत और उदार भारतीय राष्ट्रवादी सोच के पराजय की सूचना देने वाले समय की शुरूआत है.
अंग्रेज़ी शासन के दौरान जो भारत के संबंध में धारणा बनी उसके मूल में यह बात थी कि भारतीय समाज मूलत: धर्म और जाति पर आधारित समाज है जो बदलाव को नहीं स्वीकारता. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जो प्रधान विचारधारात्मक संघर्ष उभर कर सामने आया वह यही था कि एक प्रकार की शक्तियाँ इन धर्म और जातीय पहचानों को केन्द्रीय मानती थी (जिसमें साम्प्रदायिक दल, ब्रिटिश हुकूमत और पुनरूत्थानवादी शक्तियाँ एक ओर थी और कांग्रेस एवं वामपंथी समूह (समाजवादी और साम्यवादी) दूसरी ओर. भारतीय पहचान के विकास के दौर में , कम से कम 1890 से 1935 तक , यह ध्रुवीकरण कुछ इस तरह होता रहा कि यह संभावना बनने लगी कि भारत भी अन्य विकसित समाजों की तरह इन प्राक-आधुनिक सामाजिक बंधों की जगह राष्ट्रीय पहचान की ओर बढेगा. धीरे-धीरे यह जाति का जोर खत्म होगा और लोग आधुनिक पहचान के साथ सामाजिक जीवन व्यतीत करेंगे. 1931 के बाद जाति के आधार पर जनगणना भी नहीं हुई और अभी भी किस जाति के कितने लोग हैं इसे जानने के लिए या अनुमान करने के लिए 1931 की जनगणना को ही आधार बनाया जाता है. समस्या का नया सन्दर्भ तब बना जब स्वतंत्रता के बाद सरकार के नीति निर्धारण के लिए जातीय आधार को रखा गया. संकट यह था कि नीति निर्धारण के मामले में जाति को आधार बनाए रखा गया और जातीय आँकडे जनगणना के साथ उपलब्ध करने को देश की एकता के लिए खतरा माना गया ! यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति थी.
जाति और उसका समाज में स्थान भारत में परिवर्तनशील रहा है. कौन 'ऊँची' और कौन 'नीची' जाति है इसको लेकर कभी भी एकमत नहीं रहा. एक ही जाति के भीतर सैकडों उपजातियाँ रही हैं जिनमें आपस में रोटी-बेटी का संबंध सहज नहीं था. ब्राह्मण, राजपूत के अतिरिक्त किसी भी जाति को देश भर में ऊँची जाति के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था. कौन जाति के किस पायदान पर है इस बात को तूल जिस समय से दिया जाने लगा उसी समय से जाति का प्रश्न बडा प्रश्न बन गया. इतिहासकारों ने पिछले तीस वर्षों में बहुत विस्तार से इसका विश्लेषण किया है कि कैसे 1871 और 1881 के बाद जनगणना ने जातियों के बीच अपनी जाति के संगठन और अधिकारों के प्रति सचेतनता के दायित्त्व बोध को बढाया और इन पहचानों को स्थानीय सन्दर्भ से उठाकर राज्य और राष्ट्रीय सन्दर्भ प्रदान किया. जाति का प्रश्न इतना उलझा हुआ रहा है कि लगभग हर गणना करने वाले ने इस काम को करने में बहुत समस्याओं का सामना किया. हर टेबुल के साथ अन्य जातियाँ, जिन जातियों के नाम नहीं है आदि नाम से टेबुल बनाए जाते थे. कई जगहों पर जाति पूछने पर लोग अपने काम को बताते थे ! यह निश्चित है कि इस देश के बहुत सारे लोगों को अपनी जाति बताने में कठिनाई थी. पर, सरकार का आदेश था कि हर किसी की एक जाति होनी ही चाहिए इसलिए एक आदमी के साथ एक जाति का उल्लेख जरूरी थी. 1917 के बाद संकट और गहराया जब पिछडी जातियों के समूहों को एक साथ लाकर सरकारी हस्तक्षेप की शुरूआत हुई. माँटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार ने इसको वैधानिक आधार दिया और 1935 के एक्ट ने इसपर मुहर लगा दी. इस बीच दक्षिण के राज्यों में हुए दलित जातियों के आन्दोलनों, फूले, अंबेडकर एवं नायकर आदि के प्रयत्नों ने इसको सामाजिक और राजनैतिक वैधता दी. कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो की नीति के तहद इस तरह के विखंडनकारी सोच को बढाया और कांग्रेस के नेतृत्व में जारी राष्ट्रीय आन्दोलन की हवा निकालने की कोशिश की. लेकिन, सच्चाई यह भी है कि जिस तरह के हालात थे उसमें किसी भी सरकार के लिए निम्न जातियों के लोगों के लिए अलग व्यवस्था की बात करना उचित ही था.
यह बात आज कुछ विद्वान कह रहे हैं कि अगर जाति के आधार पर अगर जनगणना हुई तो देश में फूट पडेगी और लोगों में जातीयता की भावना और बढेगी. यह सही ही है. देश का हर नागरिक अगर बाध्य हो कि उसे अपनी जाति के साथ अपनी पहचान को नत्त्थी करना पडे तो यह बात सही ही होती है कि अगर सब कुछ करके भी अंतत: इसका उत्तर देना पडे कि आपकी जाति क्या है, तो हमने क्या किया?
आज की बदली परिस्थिति में जाति को लेकर हुई लोहिया युग की राजनीति का सकारात्मक पक्ष भी नहीं है. लोहिया ने जो जाति को आधार बना कर कांग्रेस विरोध की राजनीति को मजबूती दी थी उसमें आरक्षण का प्रश्न और पिछडों का उभार केन्द्रीय था. लोहिया की दृष्टि भारतीय राजनीति की दिशा को समझ रही थी और वे देश को लोकतांत्रिकीकरण के अगले चरण के लिए तैयार कर रहे थे जिसमें पिछडे भी शक्तिशाली हो रहे थे. सही विश्लेषण और नीति से शुरू हुए पिछडावाद का बाद में जो पतन लालूवाद और मुलायमवाद में हुआ उसको ध्यान में रखने पर एकबारगी यह भय तो होता ही है कि इन नेताओं के हाथों अगर जाति की संख्या का खेल नामक गोटी आ जाये तो ये देश में मार-काट मचा देंगे. लेकिन, सौभाग्य से यह अतिपिछडावाद अब उतना गैर-जिम्मेदार नहीं रह सकता. कुछ उलट फेर के बाद अब लोगों में जिस प्रकार की अपेक्षा का वातावरण तैयार हो चुका है उसको देखते हुए यह नहीं लगता कि अब फिर से अंध-पिछडावाद राजनीति पर हावी हो सकेगा. सौभाग्य की बात यह भी है कि पिछडों के नेताओं में 'विकास' और जनोन्मुखता की भावना जोर पकड रही है. फिर भी नीतिश कुमार जैसे नेताओं को कब पासवान और लालू मिलकर पटखनी दे दें कोई नहीं बता सकता. फिर भी यह तो लगता ही है कि अगर लालू जी की पार्टी आ भी गयी तो भी वो पुराने दिनों वाली निश्चिंती उन्हें नहीं प्राप्त होगी. यह एक शुभ संकेत है कि झारखंड में भी आदिवासी राजनैतिक क्षितिज पर कई नेता उभर रहे हैं. उसी तरह पिछडों में भी नेताओं की अब कोई कमी नहीं है.
[ऐसी परिस्थिति में जाति की गणना की तरफ अगर अंतत: जाना ही पडे तो कम से कम दो तीन सावधानियों को ध्यान में रखा जाए. सबसे पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जाति की गणना के दौरान मीडिया और राजनेताओं को सावधान होकर काम करना होगा. मीडिया अगर इस बात को गलत तरीके से पेश करने लगे तो सरकार को अपना दायित्व पालन करना होगा. इस देश का अंग्रेज़ी मीडिया ही देश में सबसे ज़्यादा संशय का वातावरण बनाता आया है. आपको याद होगा प्रणय राय आदि ने जब चुनाव विश्लेषण को फैशनेबुल बनाया तो वे जाति के आधार पर वोट पैटर्न को समझने और समझाने लगे थे. धीरे धीरे इस तरह के लैपटॉपी लोगों ने चुनाव परिणामों के बारे में भविष्यवाणी करने के 'वैज्ञानिक' विश्लेषण को करोडों का कारोबार बना दिया. पूरी संभावना है कि अंग्रेज़ी मीडिया इस नये मुद्दे पर बाबा लोगों को बिठाकर बहस करके देश को यह संदेश देंगे कि यह सब कुछ इस लिए हो रहा है क्योंकि सरकार जानना चाहती है कि किस जाति के कितने लोग हैं और सरकार उनको लेकर क्या नीति निर्धारित कर सकती है. सबकुछ इतना सरकार पर आधारित होता जा रहा है कि समाज के मत पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता. हिन्दी मीडिया कुल मिलाकर अंग्रेज़ी मीडिया का भदेस संस्करण बनता जा रहा है और वैकल्पिक मीडिया का भविष्य तय नहीं हो पा रहा है. ऐसे में इस विषय पर तमाम बहसों के बाद की तय राय वही होगी जो सरकार चाहेगी. ]
इस निराश कर देने वाली बात को रखते हुए एक बात कहना चाहूंगा. तृतीय विश्व के देशों के लिए यह एक चुनौती है कि वे दिखलायें कि वे भी अन्य सभी समाजों की तरह विकल्प और परिवर्तन को स्वीकार करते हैं. धर्म के मामले में कम से कम धर्मांतरण करके या अपने को नास्तिक घोषित करके एक नागरिक एक विकल्प ढूंढ सकता है. जाति के मामले में क्या विकल्प है? और फिर जिस परिवार में एक से अधिक जातियाँ आ जुटी हैं वे क्यों एक जाति में ही अपनी पहचान ढूढने के लिए राज्य द्वारा अभिशप्त हों? कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म लेकर श्रेष्ठ या निम्न नहीं होता. इस बात को अगर हम मान लें तो फिर जाति को तो सिर्फ मिटाए जाने की सोचना चाहिए. आधुनिक भारत में जाति को कमजोर करने और उसे कम प्रभावी बनाने के लिए साठ बरस का चालीस साल का समय 'ऊँची' जातियों को मिला लेकिन वे अपने दंभ और मूर्खता के कारण यह नहीं समझ पाए कि अब समय पिछडों को आगे लाने का है. मंडल कमीशन के बाद जिस तरह से जातिवादी राजनीति को बल मिला उसके कारण ही भारतीय होने की पहचान कमजोर हुई और अपनी जाति की पहचान शक्तिशाली हुई. इस परिणाम के लिए तथाकथित ऊँची जातियों का औद्धत्य (औडासिटी) जिम्मेदार है जिसने लंठ पिछडावाद को राजनैतिक रूप से शक्तिशाली बना दिया. सिर्फ नयी रौशनी की एक आदर्शवादी उम्मीद अब बची है जो देश के किसी किसी कोने से कभी कभी दिखलाई पडती है. भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति लोगों में आस्था अगर सच्ची होगी तो इन प्रयासों को जन समर्थन मिलेगा . नहीं तो जाए भैंस पानी में ... .
[Sablog, June 2010]

हिंसा से प्रभावित होने वालों को भी हिंसक होने का अधिकार नहीं

"हिंसा से प्रभावित होने वालों को भी हिंसक होने का अधिकार नहीं."
प्रश्न: हिंसा में जिस वृद्धि की बात की जा रही है, उसे कौन बढा रहा है?
उत्तर : इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं कुछ बातों पर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहूंगा. हिंसा एक हद तक बुखार की तरह है. जैसे बुखार अपने आप कोई रोग नहीं है बल्कि एक संकेत है किसी बीमारी का. जैसे ही वह बीमारी ठीक होगी बुखार अपने आप उतर जाएगा. हिंसा को समाज में व्याप्त बुराई के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है. समस्या तब अधिक हो जाती है जब इस प्रश्न पर राज्य-सत्ता जैसे संस्थान को जोडकर इस पर विचार किया जाता है. राज्य प्रभुत्त्वशाली वर्ग के हितों के हिसाब से ही काम करता है. इस राज्य को एक विशेषाधिकार प्राप्त है. यही वह चीज है जिसके कारण यह सबसे शक्तिशाली है. वह अधिकार है 'हिंसा का अधिकार'. सभी संस्थाओं में सिर्फ इसे यह अधिकार है कि यह हिंसा कर सकती है. आधुनिक युग में, जिसमें राज्य-सत्ता के अधिकार सबसे व्यापक हैं, किसी को आत्महत्या का भी अधिकार नहीं है. सामान्यत: यह माना जाता है कि राज्य उस देश के समस्त नागरिकों की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्त्व करता है. समस्या तब होती है जब राज्यसत्ता अपनी वैधता को खो दे, यानि जब राज्य अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके नागरिकों की सामूहिक इच्छा का अनादर करके शासन करने की कोशिश करे. विख्यात वामपंथी चिंतक फ्रांज फेनन मानते थे कि 'उपनिवेशवाद हिंसा है अत: इसके खिलाफ हिंसा का प्रयोग सर्वथा उचित है". दुनिया के तमाम क्रांतिकारी विचारकों का मत भी यही है कि जब राज्य जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा हो और अपने को बचाने के लिए उसके पास उपलब्ध शक्ति- हिंसा का सहारा लेने लगे तो वह अपने शासन के अधिकार को खो देता है. ऐसे में राज्य सत्ता के खिलाफ हिंसा का प्रयोग वैध है. युद्ध में शत्रु के द्वारा प्रयुक्त अस्त्र के हिसाब से ही युद्ध किया जाता है. अत: अनुचित राज्य सत्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का रास्ता ही सही रास्ता है. इसी तर्क के कारण फेनन अल्जीरिया के क्रांतिकारियों द्वारा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ हिंसा का प्रयोग बिल्कुल सही मानते हैं.
इस के विपरीत गाँधी जैसे विचारक हैं जो हिंसा को हर रूप में गलत मानते हैं. उनकी दृष्टि में अगर औपनिवेशिक शक्तियाँ हिंसा का प्रयोग करती हैं तो इसका उत्तर प्रति हिंसा से देने का अर्थ है पहली शक्ति द्वारा हिंसा के प्रयोग का औचित्य सिद्ध करना. अगर हम हिंसा का विरोध अहिंसा से करेंगे तो हिंसा करने वाला या तो बदलेगा या उसके बल प्रयोग की नैतिकता खत्म होगी. इस प्रकार का अनैतिक बल प्रयोग चल नहीं सकता.
मुझे लगता है गाँधी की बात बहुत गहरी है और इसे ठीक से समझने की जरूरत है. देखा जाए तो जब से लोकतंत्रात्मक व्यवस्था दुनिया में आयी है, किसी भी देश की राज सत्ता अपने देश की आम जनता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकती. सिर्फ तानाशाही और फासिस्ट राज्य सत्ता ही जनता की इच्छा का अनादर करने का जोखिम उठाती है. अगर इस बात को मान लिया जाए तो गाँधी का कहा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है. यह ज्यादा कारगर तरीका है. हालाँकि यह भी कहना पडेगा कि किसी और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधी का अहिंसात्मक आन्दोलन इतना प्रभावी नहीं भी हो सकता था. आप बर्मा का उदाहरण भी ले सकते हैं. चाहे तो तिब्बत का भी उदाहरण ले सकते है जिसमें गाँधीवादी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलनों को वह सफलता नहीं मिली जो भारत में संभव हो सकी.
अब आपके प्रश्न के उत्तर की ओर जाया जाए. आपने विषय को प्रस्तावित करते हुए बहुत ही सही लक्षित किया है कि "मनोरचना में विवेक और कल्याण का दायरा सिकुडता जा रहा है." यही वह बात है जिससे बात शुरू की जा सकती है. यह क्यों हो रहा है? क्या इससे इतर कुछ और हो सकता था? मुझे लगता है आधुनिक सोच इससे इतर कुछ और कर ही नहीं सकता था. अपने देश में इस संबंध में ज्यादा चर्चा नहीं होती कि आखिरकार आधुनिक यूरोपीय सोच के दायरे में इस देश की सोच को क्यों 'रिड्यूस' किया जाता रहा है. यूरोप में सौ से भी ज्यादा सालों से यह बात समझी जाती रही है कि आधुनिकता के भीतर भयानक विध्वंसकारी तत्त्व हैं जो हमारे मन को 'वेस्टलैंड' में बदल देंगे और विवेकशील मनुष्य एक उपभोक्ता 'बायो मास' में तब्दील हो जाएगा. यूरोप या पश्चिम विश्व नहीं है लेकिन वही मान लिया गया है. आज साहित्य से लेकर आर्थिक,-राजनैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक, वैचारिक-भाषिक, धार्मिक-आध्यात्मिक, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, परिवार पडोस, राष्ट्र-राज्य , चेतन-अवचेतन, मीडिया-फिल्म, लोक-विश्व, न्याय-नैतिकता आदि सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जारी है. यह प्रतिस्पर्द्धा ही तो हमें अपने आंतरिक विवेक से विच्छिन्न करके हमसे वही करवाती है जिसे करते हुए हम अपने लिए ही 'अजनबी' बन जाते हैं. हमारी सारी लडाई हमारे अपने भीतर एक हिंसा का अनंत सिलसिला रचती है जिसमें हम जन्म से लेकर मृत्यु (और उसके बाद भी) टँगे रहते हैं. मार्टिन हाइडेगर की कई स्थापनाओं से असहमत होते हुए भी मुझे लगता है उनके सोच ने आधुनिक मनुष्य की विडंबना को ठीक से पकडा है. जिसे सार्त्र 'नथिंगनेस' कहते हैं वही तो हमारे आधुनिक की नियति है. आप फ्रैंकफुर्त स्कूल के विद्वानों को पढते हुए महसूस करेंगे कि आधुनिक 'मैकेनिकल' मनुष्य के प्रति पश्चिम में भी चिंता रही है. जब मार्कुज 'वन डायमेंशनल मैन' लिखते हैं तो इस बात का पूरा विवरण हमारे पास उपलब्ध हो जाता है कि यही पश्चिमी मनुष्य को होना था. राम मनोहर लोहिया ने इस बात पर बहुत ही सुंदर टिप्पणी की थी. लेकिन, इन सबके बावजूद भारत समेत पूरी दुनिया वही खेल खेल रही है. प्रतिस्पर्द्धा को अवगुण मानने की दृष्टि हमारी भारतीय सोच का प्रधान तत्त्व रहा है इसका स्मरण कराना भी अब इस देश में पिछडेपन का चिह्न माना जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. दुनिया भर में शांति के इस दौर में करोडों लोग हिंसा का शिकार हो रहे हैं और सब कुछ आधुनिक बनने और आगे बढने के लिए अपरिहार्य माना जा रहा है. आधुनिक पश्चिमी सोच का वैश्विक वैचारिक वर्चस्व इस जगत की भयानक हिंसा के मूल में है.
2. हिंसा किसके हित में है?
उत्तर: हिंसा करने वाला समझता है कि वह अपने हित में हिंसा कर रहा है लेकिन यह भ्रामक है. एक स्थूल उदाहरण लें. स्टालिन ने, हिटलर ने, सद्दाम हुसैन ने, बुश ने जो हिंसा की वह अपने लोगों के हित में की है. उनका हाल क्या हुआ. जिसके लिए किया उनका क्या हुआ? इतिहासकार एरिक हॉब्सबाम पूरी दुनिया के बीसवीं सदी के इतिहास का एक यथासंभव सटीक विश्लेषण करके इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दुनिया में निकट भविष्य में शांति की कोई संभावना नहीं है. वे जो आंकडे देते हैं वे चौंकाने वाले हैं. वे कहते हैं कि आधुनिक "बीसवीं शताब्दी आज तक की सबसे हिंसक शताब्दी रही है. युद्ध से संबंधित हिंसा में कुल 18 करोड 70 लाख लोग मारे गये हैं... इस शताब्दी में युद्ध अनवरत चलता रहा है. ... द्वितीय विश्वयुद्द का कोई समापन नहीं हुआ (जैसा कि अमूमन युद्ध के बाद होता है). जाहिर है, युद्ध द्वारा किसी भी स्थाई समाधान नहीं हुआ है. किसी अफगानिस्तान या इराक तक को युद्ध की हिंसा के द्वारा सबक नहीं सिखाया जा सका. किसी का हित सधा हो, लगता नहीं है. जिन संगठनों ने हिंसा के द्वारा अपनी जनता के लिए अपनी सरकारों से हिंसा के द्वारा मुकाबला किया है उनसे भी कुछ नहीं बन पडा. नेपाल से लेकर श्री लंका तक के नजदीकी उदाहरण यही संदेश देते हैं कि इस तरह के हिंसक राजनैतिक प्रयास फौरी सफलताएं भले ही पा लें, इसके दूरगामी परिणाम शुभ नहीं होते. अफ्रीका में विभिन्न देशों में हिंसात्मक गतिविधियों से जुडे संगठनों का हाल तो और भी भयानक है. वहाँ लाखों लोग मर रहे हैं और किसी का कोई भला नहीं हो रहा है. क्या इस बात की चर्चा की ज़रूरत है कि लश्करे तोईबा और अन्य इस्लामिक हिंसा में विश्वास करने वाले संगठनों से सबका (विशेषकर मुसलमानों का) कितना अहित किया है? वामपंथी हिंसा में विश्वास करने वालों से भी किसी का हित नहीं हुआ है.
3. हर क्षेत्र में केंन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति ने हिंसा को नहीं बढाया है?
उत्तर: इसमें कोई संदेह नहीं है. इसको समझने के लिए दो उदाहरणों को पास पास रखकर समझा जा सकता है. कश्मीर में जिस तरह से केन्द्र ने शांति बहाल करने की कोशिश की और आतंकवादी गतिविधियों को समाप्त करने की कोशिश की उसमें सफलता तभी मिलनी शुरू हुई (जितनी भी मिली है) जब स्थानीय राजनैतिक प्रक्रिया शुरू की गई. केन्द्र अपने बूते यह नहीं कर पाया. सख्ती करके भी नहीं. पंजाब में भी यही हुआ. आज खालिस्तान आन्दोलन जैसा खतरनाक आन्दोलन खत्म हुआ जब स्थानीय लोगों ने इसमें पहल की. असम में भी यही हुआ. केन्द्र के बल से किसी भी आन्दोलन को दबाना बहुत मुश्किल है. बाहरी ताकत लगाकर दबाव तो बनाया जा सकता है लेकिन स्थायी रूप से प्रभावी समाधान नहीं दिया जा सकता. अमरीका ने अफगानिस्तान और इराक के उदाहरण से यह पाठ सीखा है.
4. हिंसा की कितनी जरूरत राष्ट्र-राज्य को है?
उत्तर: मैं पहले भी कह चुका हूँ कि राज्य का अस्तित्व हिंसा के बल पर ही है. यह अकारण नहीं है कि तोलस्तोय और गाँधी समेत बहुत सारे शांतिप्रिय नेताओं और चिंतकों ने राष्ट्र-राज्य को जरूरी नहीं समझा. वे अगर इसके नाश के लिए तैयार न भी हुए हों तो भी यह तो चाहते ही थे कि इसका दखल लोगों के जीवन में कम से कम हो.
वैसे देखा जाए तो राष्ट्र राज्य जानबूझ कर नहीं मजबूरी में हिंसा करता है. पर यह मजबूरी ऐसी है कि इसके बिना उसका कोई औचित्य रहेगा ही नहीं. आम वामपंथी दृष्टि के अनुसार राज्य का प्रधान दायित्व है 'हैव्स" को " हैव नाट्स" से बचाना और यथास्थिति को बनाए रखना. उदारनैतिक दृष्टि के अनुसार राज्य का दायित्व है नागरिकों की स्वतंत्रता की, उसकी संपत्ति की रक्षा करना और जहाँ तक संभव हो कम से कम हस्तक्षेप करना. सीमा पर रक्षा, पुलिस और डाक व्यवस्था के अलावा किसी भी मामले में राज्य की उपस्थिति को उदारवादी नापसंद करते हैं. कुल मिलाकर फासिस्ट और अन्य प्रकार के तानाशाहों ने ही राज्य की जरूरत को जरूरी समझा है.
राज्य है तो हिंसा है और एक हद तक राज्य की हिंसा को तब तक सही माना जाता है जब तक राज्य को आम जनता की ओर से वैधता प्राप्त है. अगर राज्य कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए या देश की सीमा की सुरक्षा के लिए या फिर किसी गंभीर आंतरिक खतरे का मुकाबला करने के लिए हिंसा का सहारा लेती है तो जनता उस हिंसा को उचित मान लेती है. श्री लंका की वर्तमान सरकार द्वारा जिस हिंसक तरीके से एल टी टी का जाफना से सफाया किया गया उसका श्री लंका की जनता ने समर्थन किया.
5. संगठित हिंसा की समाप्ति किस संगठित विचार या प्रयास से संभव है?
उत्तर: कुछ वर्ष पूर्व विख्यात दो दार्शनिकों -देरिदा और हैबरमास ने इस पर विचार किया था. उसके आधार पर एक विद्वान ने यह सुझाव दिया कि जो शोषित हैं उन्हें भी हिंसा का अधिकार नहीं है. हैबरमास कहते हैं कि इस बात को समझने की जरूरत है कि " बीइंग द सब्जेक्ट ऑव वायलेंस गिव्स अस नो राइट टू बी वायलेंट इन रिटर्न'. यह एक उपयोगी टिप्पणी है. स्पष्ट है कि यह मत गाँधी के विचारों के बहुत निकट है. कई लोगों को यह बात कुछ अटपटी लग सकती है. हम अपने सहज बोध से जानते हैं कि हिंसा आत्म-रक्षार्थ भी किया जाता है और अपने अधिकार के लिए भी कभी कभी हिंसा होती है. भारतीय संदर्भ में हाल ही में अरूंधती राय ने जन-जातियों के साथ राज्य द्वारा किए जा रहे अन्यायों के सन्दर्भ में जन-जातियों द्वारा किए गये हिंसा को उचित ठहराया है. देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादियों द्वारा किए जा रहे हिंसक आन्दोलनों के समर्थन में भी कुछ लोगों ने लिखा है. इस बात को केन्द्र में रखकर विचार करना उचित होगा. हैबरमास एक अन्य बात को भी इस सन्दर्भ में जोडते हैं जो उनके पूरे वक्तव्य को स्पष्ट करता है. वे कहते हैं- "हिंसा के परित्याग के लिए यह जरूरी है कि लोग यह समझें कि कहीं भी किसी के ऊपर हो रही हिंसा को वे अपने ऊपर हो रहे आघात के लिए लें". [इस संबंध में और विस्तार के लिए देखें- एल. जी. बोरादरी (Borradori), फिलासफी इन ए टाइम ऑव टेरर :डायलॉग विद जुर्गेन हैबरमास एंड जॉक देरिदा (2003)] हैबरमास इस सन्दर्भ में दो बातों का उल्लेख करना नहीं भूलते; उनके अनुसार आधुनिक समाज ने पारंपरिक समाज को ध्वस्त तो कर दिया लेकिन उसका विकल्प तैयार नहीं किया. आतंकवाद आधुनिकता का निगेटिव पक्ष है जिसका उदय इस कारण से हुआ है क्योंकि आधुनिकता ने जो दर्द पैदा किया उसकी दवा का इंतजाम नहीं किया. आतंकवाद एक आधुनिक युग की समस्या है. यह प्राक आधुनिक युगों की हिंसा से भिन्न है. पहले हिंसा का खत्म होना तय था चाहे वह जितना भी भयावह हिंसा क्यों न हो. आज आतंकवाद की हिंसा से भी ज्यादा समस्या पैदा करने वाली बात यह है किसी भी समय फिर से हो सकने वाली हिंसा की आशंका है. 9/11 के बाद अमरीका जितनी भी व्यवस्था कर ले वह इस भय से मुक्त नहीं हो सकता कि ऐसी घटना कभी भी कहीं भी घट सकती है. यह बात और भी भुलाना कठिन है कि अमरीका ने ही ओसामा बिन लादेन को शीत युद्ध के दौरान ट्रेनिंग दी थी और 9/11 के आतंकियों ने पश्चिमी देशों में ही जहाज उडाने की ट्रेनिंग ली थी.
मुझे लगता है हैबरमास की इन बातों से संगठित हिंसा की समाप्ति की ओर एक जरूरी पहल संभव है.
इसमें संदेह नहीं कि जन-जातियों के साथ अन्याय लगातार हुए हैं और इस अन्याय में राज्य की भी भूमिका रही है. जिस प्रकार अमानवीय तरीकों से जन-जातियों को उनके वास-स्थानों से विस्थापित किया जाता रहा है और जिस प्रकार उनकी गरीबी बढी है उसे देखते हुए कई लोगों को लगता है कि उनका प्रतिवाद- चाहे हिंसक हो तो भी समर्थन योग्य है. दूसरी ओर एक अन्य प्रकार की परिस्थिति में बंगाल के कुछ इलाकों में राज्य समर्थित शासक दल द्वारा चलाए जा रही संगठित हिंसा का जिस तरह प्रतिवाद हुआ है उसके संदर्भ में भी यह कहा जा सकता है कि एकमात्र हिंसक तरीके से ही शासक दल के अत्याचार और वैज्ञानिक तरीके से चलाए जा रहे दलीय आतंकवाद का डटकर मुकाबला किया जा सकता था. इस प्रसंग में दो तीन बातों का उल्लेख जरूरी है. बंगाल के जंगल महल इलाके में आज से 30 बरस पहले सभी दलों के समर्थक थे. कुछ कांग्रेसी थे कुछ समाजवादी थे और कुछ कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक थे. पिछले दिनों यह पता चला कि अब इस इलाके में एक ही दल है -सी पी एम बाकी सबको खत्म कर दिया गया है. पता चला है कि येन केन प्रकारेण- छल-बल-कौशल से लेकर क्रूर हिंसा तक के प्रयोग द्वारा यहाँ सी पी एम के विरोधियों का सफाया कर दिया गया. सी पी एम का दबदबा इतना बढ गया था कि कुछ लोकप्रिय विरोधी दल के नेताओं का खून कराने के बाद भी पार्टी के नेताओं का कुछ नहीं हुआ. लोगों में पार्टी का भय इतना अधिक हो गया था कि लोग डर के मारे मुंह नहीं खोलते थे. ऐसे में धीरे धीरे एक विरोध जन जातियों में पैदा हुआ और जब मौका मिला सी पी एम के नेताओं और समर्थकों का सफाया शुरू हुआ. अब बदले हुए माहौल में सी पी एम के समर्थकों ने पहली बार जाना कि जान का भय क्या होता है. इस भय ने धीरे धीरे सी पी एम विरोधियों में साहस पैदा किया और विभिन्न इलाकों में सी पी एम के आतंक पैदा करने वाले दलीय आतंकवाद को हिंसक तरीके से चुनौती दी. अब इस प्रकार की हिंसा को कैसे देखा जाए?
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस व्याख्या में दम है. आज सी पी एम बंगाल में रक्षात्मक मुद्रा में दिखलाई पड रही है तो इसका बडा कारण सी पी एम की न दिखलाई पडने वाली हिंसा (जिसने विरोधियों को आतंकित कर रखा था) का वैसा ही जवाब दिया जाना है. इन जन जातियों के नेताओं के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी यह कहना पडेगा कि इस रास्ते से न कोई समाधान होगा और न ही जन जातियों को कोई राहत ही मिलेगी. होना यह चाहिए कि किसी मजबूरी में हिंसात्मक आन्दोलनों में आए लोगों को जैसे ही सुयोग मिले लोकतांत्रिक पद्धति की प्रक्रियाओं से जोड लिया जाना चाहिए. ऐसे उदाहरण दुनिया में बहुत हैं जिसमें हिंसा का रास्ता छोडकर लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुडे हैं. मिश्र से लेकर फिलिस्तीन तक ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं. इस देश में पिछले वर्षों में नक्सलवादी आंदोलन का बहुत विस्तार हुआ है. आज सरकार इस तरह के आंदोलनों को देश की सुरक्षा के लिए बडा खतरा मान रही है और युद्ध स्तर पर इसका मुकाबला करने के लिए अपनी फौज को इस काम में लगाए हुए है. आए दिन नक्सली और सेना के बीच की मुठभेडों में दोनों ओर से मारे गये लोगों की तस्वीरें अखबारों में दिखलाई पडती हैं. ऐसे में कभी कभी लगता है कि अब इस देश के एक बडे हिस्से में राज्य और नक्सली अपने अपने अधिकार के लिए खूनी लडाईयाँ चलती रहेंगी. यह हो भी सकता है. लेकिन, यह अंतत: राज्य के द्वारा नक्सलियों के दमन में ही समाप्त होगा. इस बात को अगर ठीक से समझ लिया जाए तो संभव है देश के शांति प्रिय नेताओं की पहल का लाभ लेकर नक्सली लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हों और अपना राजनैतिक आंदोलन चलाते रहें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो सैकडों- हजारों पुलिसकर्मी और नक्सली इस हिंसा की भेंट चढ जायेंगे.
निश्चित ही राज्य को भी इसमें पहल करनी पडेगी. इतिहासकार हॉब्सबाम बताते हैं कि दुनिया के बहुत सारे देशों में राज्य सत्ता के समानांतर कई सत्ताएं उभर गयी हैं जो राज्य की सामरिक शक्ति से होड लेती हैं. उनका दमन राज्य कर ही ले यह जरूरी नहीं, जब तक ऐसा नहीं होता शांति बहाल नहीं हो सकती. राज्य अगर सिर्फ दमन करने के इरादे से काम करेगा तो संभव है यह कठिन प्रमाणित हो. ऐसे में दोनों ओर से पहल होनी चाहिए. मीडिया और संस्कृतिकर्मियों का भी यह दायित्व है कि वह हिंसा के मार्ग को एक विकल्प के रूप में देखने प्रवृत्ति का विरोध करे और लोगों में यह जागरूकता पैदा करे कि हिंसा से स्थायी राजनैतिक समाधान संभव नहीं. साथ ही राज्य पर भी दबाव बनाए कि हर तरह की हिंसा को आपराधिक हिंसा न माने और ऐसा सामाजिक माहौल बनाए जिसमें भय और अविश्वास कम हो. एक आधुनिक दृष्टि रखने वाली सरकार और आधुनिक बनने की होड में पिली जनता में यह विवेक तभी आ सकता है जब इस समाज और संस्कृति के उदात्त तत्त्वों के प्रति लोगों की जागरूकता बढे. चाहे जितना भी कठिन हो यह याद रखा जाना चाहिए कि इसी देश में सौ साल पहले एक अहिंसक राजनैतिक आंदोलन हुआ था जो विश्व का सबसे बड स्वाधीनता संग्राम था

Saturday, 28 August, 2010

गनीमत है व्योम जी ने बंगाल को इस बार बख्सा !

कोलकाता के एक हिंदी कथाकार की भविष्यवाणियाँ पढते हुए कुछ समय बीत गया है. मुझे लगता है इस कथाकार की बातों को मित्रों के बीच रखा जाना चाहिए. लोगों को मज़ा आयेगा. हो सकता है इन बातों में अगर 'मेरिट' होगा (जिसे मुझ जैसा आदमी समझ नहीं पा रहा) तो लोग मुझे समझने में मदद करेंगे. ये महाशय नाम बदल बदल कर कभी राधेलाल तो कभी व्योम तो कभी दुबे बनकर अपने फ्यूचरिस्टिक सोच का प्रचार कर रहे हैं. बडी मेहनत कर रहे हैं पर हाय रे हिंदीवाले पूर्वांचली वे इन बातों को अभी तक ठीक से समझ नहीं सक रहे.
क्या हैं ये विचार. बातें तो उन्होंने बहुत घिनौने तरीके से भी कही हैं लेकिन ब्लॉग की गरिमा को ध्यान में रखते हुए एक ही छोटी टिप्पणी दे रहा हूं. आशा है लोग इस महान व्यक्ति के महान उद्गारों को समझने में मेरी मदद करेंमन भर आया,ग्लानि और पाप बोध के हिमालय के नीचे दबा पडा हूं। सचमुच हम औरत को ऐसे रखते हैं,दबा कर ,कुचल कर,बिस्तर और चादर की तरह…फिर अपने चारो ओर नजर दौडाई।


विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा मैंने देखा नहीं-हो सकता है -वो नजर ही अल्लाह ने ना बख्शी हो। यह क्या प्रांत विशेष ,भाषा विशेष का सच हो सकता है,या भारत में यूनिवर्सल सच है। बिहार का सच पूरे भारत का सच नहीं है।पूरे हिंदी प्रदेश में भी साम्य नहीं है। कस्बे का सच महानगर का सच नहीं है। काम-काजी महिलाओं का सच सारी औरतों का सच ना हो?पढी लिखी होने के अपने पचडे हों,मह्त्वाकांक्षा क्या -क्या नहीं करवाती। महत्वाकांक्षा ना कह कर लालच-लोभ भी कह सकते हैं। अनप्रोडक्टिव महिला-पुरुष को कैरियर बनाने के लिये दुष्चक्र में फंसना पडता है। स्त्री थोडी ज्यादा वलनरेवल है ,पुरुष से। ये समस्या ‘गो पट्टी’ की ज्यादा है,मीडीया,कॉलेज,सरकारी नौकरी ,हिंदी,कस्बा,

(प्रदेश का नाम लेना ठीक नहीं होगा),ये सब मिल कर एक गोल बनाते हैं-जहां ये बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है। बंगाल में ऐसा नहीं होता,शायद हरियाणा-राजस्थान,पंजाब में भी नहीं। दक्षिण भारत में भी नहीं । अब जिनके लिये अकादमिक कैम्पस ही भारत है,उनकी बात अलग है। जहां दूसरे रोजगार हैं,इटरप्योनोरशिप है ,उन्हें इस गलाजत के बगैर भी डिग्निटी सुलभ है। सरकारी नौकरी पाना जब लॉटरी लगने जैसा हो गया है,तो फिर लॉटरी की कीमत भी वसूली जाना घोर अपराध नहीं है। 5 साल जाने दीजिये सरकारी नौकरियों के लिये ‘सुपारी किलर’ तैनात होंगे। रेल मंत्रालय अगर गरीब मुल्क में 5-10 लाख मुवाअजा देने लगे तो लोग बाप -भाईयों-माता-बहनों को रेल से धक्का देकर हत्या पर उतारू होंगे। गरीब मुल्क है ना,खाई चौडी हो रही है,और पूरा समाज इस खाई में गिर कर मरेगा। :ps:सांसदों का वेतन पांच गुना बढ गया है,दुनिया के सरकारी चाकर एक हों।इंक्लाब जिंदाबाद

गे.
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Tuesday, 10 August, 2010

विष्णु खरे की भडास और हिंदी की गरिमा का प्रश्न




विष्णु खरे ने जनसत्ता में 10 और 11 अगस्त को जो कुछ लिखा है उससे और कुछ हुआ हो या नहीं हिंदी की गरिमा को ठेस लगी है. लगभग अराजक तरीके से राय-कालिया प्रश्न को अतिरेकी वक्तव्यों के साथ पेश करते हुए वे यह कह बैठे कि यह महाभारत है और जो उनके (विष्णु 'कृष्ण'?) साथ नहीं हैं वे कौरव दल (राय 'दुर्योधन' ?) के हैं. बगैर सिर पैर के वाक्यों और दक्षिण एशिया के समाज के बारे में सरलीकरणों से लदे इन लेखों में व्यक्तिगत आक्षेपों की ऐसी झडी लगा दी गई है कि पाठक यह समझ ही नहीं पाता है कि मुद्दा क्या है. अब इस वाक्यों को देखिए- " ...कैरियर को गतिशील बनाने के लिए संपादकों, आलोचकों, सहधर्माओं, प्रकाशकों, प्राध्यापकों और निजी तथा सार्वजनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों के बीच कुछ ज्यादा ही सक्रिय है- यद्यपि यदि पुरूष लेखक वैसा करते हैं तो स्त्रियां क्यों न करें, लेकिन दक्षिण एशिया में औरत होने की ऎसी ट्रेजिडी है नीच '- और मैं समझता हूं कि नारी गरिमा के लिए कहीं भी अशोभनीय है और नैतिक रूप से संदिग्ध है. महिला लेखक कम से कम पुरूष लेखकों के पतन का अनुकरण न करें."

आप सिर धुनते रह जायेंगे और आपको यह समझ में नहीं आयेगा कि इस कथन को राय के कथन से कितना अलगा कर देखा जा सकता है. अंतर है भी तो कितने का?

अगर इस कथन को उनके उस कथन से जोड कर देखा जाए जिसमें उन्होंने हिंदी के पूर्वांचल (बिहार-उत्तर प्रदेश) के युवा लेखकों के खिलाफ अपनी भडास निकाली है- " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."

क्या बच जाता है कहने को?

यह बहुत अच्छी बात है कि खरे साहब को वेश्या गमन की जरूरत नहीं पडी लेकिन इस बात को इस प्रसंग में लाने का क्या कोई औचित्य है?

हिन्दी से जुडे तमाम संगठनों के बारे में उनकी राय भी अतिरेकी है- "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है."

और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिसकी चर्चा इस भडास निकालने वाले आलेख में हैं. हिंदी का आम पाठक इन चर्चाओं से व्यथित होगा. कहते हैं कि विभूति नारायण राय जब कपिल सिब्बल से मिलने गये तो उन्होंने सिब्बल साहब को याद दिलाया कि जब मंटो पर अश्लीलता का मुकदमा चलाया गया था तो सिब्बल के पिता ने उनका केस लडा था. मंत्री जी ने जो उत्तर दिया वह दिलचस्प था- "पर मंटो उपाचार्य नहीं थे."

विष्णु खरे एक पढे लिखे और सम्मानित पत्रकार-चिंतक हैं. एक आम हिंदी वाला जब यह कहता है कि हिंदी विभाग 'चकलाघर' और 'पुरूष-वेश्याओं' के अड्डे हो गये हैं तो उसकी झल्लाहट को, उसकी खीज को समझने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन विष्णु खरे जब इस बात को कहते हैं तो उसके निहितार्थ होते हैं. यह अकारण नहीं है कि अशोक बाजपेयी से लेकर विष्णु खरे तक नामवर सिंह की चुप्पी का उल्लेख कर उसे 'शर्मनाक' घोषित करते हैं. जिस तरह की भाषा का प्रयोग विष्णु खरे ने जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठ पर किया है उसे किसी भी तरह से भाषा का नैतिक प्रयोग नहीं कहा जा सकता है.

किसी भी लोकतंत्र में गलती करने और माफी मांगकर भूल सुधार करने का सुयोग होना चाहिए. सिर्फ मृत लोग गलतियां नही करते. जिस तरह से छिनाल शब्द के अनुचित प्रयोग के कारण विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया के विरूद्ध लोगों ने विरोध प्रगट किया वह प्रमाणित करता है कि सब लोग सब कुछ बर्दाश्त नहीं करेंगे. लेकिन, यह क्या कि इस ओट में आप एक संपादक को हटाने की और हिंदी के एक विश्वविद्यालय से सभी नैतिकता वाले हिंदी लेखकों के बायकॉट करने वालों का गिरोह तैयार कर लें. और वह भी भद्दे और कुत्सित भाषा में अभियान चलाकर.

जनसत्ता ने इस पूरे मसले पर विरोध का जो अभियान चलाया उसका औचित्य हो सकता है, लेकिन अब इस प्रसंग को सही परिप्रेक्ष्य देने की जरूरत है. इस प्रसंग का जिस तरह एक राजनेता लाभ लेने की सोच सकता है वैसे ही यह सोचना कि जो हमारे दल के साथ मत दे रहा है वही सही है. 'बाकी सब पर नजर रखा जाना चाहिए' वाला विष्णु खरे टाइप सोच अराजक और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को बढावा देगा. इस तरह के प्रचारात्मक लेखन से जनसत्ता की छवि को ठेस पहुंचती है.

[पुनश्च: खरे साहब को लगता होगा कि सिर्फ वही लोग इस प्रसंग में रवीन्द्र कालिया के 'पक्ष' में हस्ताक्षर करेंगे जिन्हें वर्धा का टिकट कटाना है या ज्ञानोदय में छपने की भूख है. मैंने इस भद्दे प्रकरण में हस्ताक्षर करने का निर्णय विष्णु खरे का आलेख (प्रथम भाग) पढने के बाद लिया. मैंने ज्ञानोदय में कभी अपना कुछ छपने नहीं भेजा. एक उपन्यास का ड्राफ्ट भेजा जो दो साल तक ज्ञानपीठ में पडा रहा. विचार भी नहीं किया गया. बाद में एक अन्य प्रकाशक ने इसे छापा. महात्मा गांधी विश्वविद्यालय मैं कभी गया नहीं. राय से मेरा कोई परिचय नहीं है. मैंने यह सिर्फ एक अन्यायपूर्ण तरीके से किए जा रहे अभियान का विरोध करने के लिए किया है. हिंदी में लोकतांत्रिक स्पेस बना रहे और लोग खुल कर बोल सकें, प्रतिवाद कर सकें ऐसी भावना रखता हूं. विष्णु खरे को विद्वान व्यक्ति और बडा कवि मानता हूं. मेरे इस प्रतिवाद का अर्थ उनका असम्मान करना नहीं है.]

हितेन्द्र पटेल इतिहास विभाग, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय, 56 ए, बी टी रोड, कोलकाता 60.

माफी मांगें विष्णु खरे

विभूति नारायण राय ने तो माफी मांग ली अब देखना है विष्णु खरे क्या करते हैं

विभूति नारायण राय ने 'छिनाल' शब्द का आपत्तिजनक प्रयोग किया और उन्हें प्रतिवाद के सामने अंतत: माफी मांगनी पडी. जिसने भी वह इंटरव्यू ठीक से पढा होगा उन्हें यह पता होगा कि उस टिप्पणी का एक संदर्भ था, लेकिन उनके वक्तव्य से युवा लेखिकाओं की भावना को ठेस लगती है इस आरोप के कारण ही राय को प्रतिवाद के सम्मुखीन होना पडा. इस तर्क को अगर माना जाए तो विष्णु खरे के लेख से तो हिन्दी समाज के तमाम लोगों का ही अपमान करने की कोशिश की गयी है. जिस असभ्य तरीके से खरे ने पूर्वांचल के युवा लेखकों के बारे में एक आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है.



जब से विभूति नारायण राय का इंटरव्यू आया है एक मुहिम जनसत्ता से लेकर तमाम जगहों में शुरू हो गयी है. साहित्य में प्रमाद 1 (जनसत्ता 10 अगस्त) के आते आते यह स्पष्ट हो गया है कि हिन्दी के कुछ लोग अपने राग-द्वेष को छुपाकर अपनी कुंठाओं को व्यक्त करने का ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते. विष्णु खरे को एक प्रखर बुद्धिजीवी के रूप में जानने वालों के लिए 'साहित्य में प्रमाद' प्रसंग 'छिनाल प्रसंग' से कम कुत्सित नहीं लगेगा. खरे ने जिस अराजक सोच के साथ विभूति नारायण राय प्रसंग को अपनी कुंठाजनित सोच से जोडा है उसके भौंडे प्रदर्शन को इस लेख में देखकर हिन्दी के एक कवि के ऐसे घोर पतन पर रोया ही जा सकता है. जिस भाषा का प्रयोग उन्होंने हिन्दी के यशस्वी विद्वानों के लिए किया है वह उनकी कुंठाओं को सामने लाने वाला है. खरे ने अंग्रेज़ी की किताबें पढी हैं और यूरोपीय ज्ञान से जुडने के बाद बहुत सारे लोगों को अपने देश के लोग गंवार और अपनी भाषा के विद्वान 'मीडियाकर' लगने लगते हैं. उन्हें मन ही मन इस बात की कचोट रहती है कि उन्हें हिन्दी समाज के लोग वो सब कुछ क्यों नहीं दिलाते जो अंग्रेज़ी वालों को इस देश में मिलता है. मेरा अनुमान है कि विष्णु जी रामविलास शर्मा को बहुत ही 'ओवरैस्टिमेटेड मीडियॉकर' से ज्यादा नहीं मानते होंगे. खरे साहब का यह हाल है कि वे 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' तक भी यूनान की कहावत से आते हैं. पता नहीं कैसे खरे इस बात से अपनी बात शुरू करने का दंभ दिखाते हैं कि उन्होंने अपने 'पूर्वाग्रहों ' के कारण विभूति नारायण राय के सानिध्य से बचे ! वह यह बतलाना चाहते हैं कि वे कितने पाक दामन हैं. हिंदी की सारी दुनिया फंतासियों में जीने वाली, कल्पनातीत अपात्र वेतनमान के साथ यौनशोषण को बढावा देने वाली दिखलाई पडती है. यहीं तक नहीं वे मानते हैं कि अनेक हिन्दी विभागों को पुरूष वेश्याओं के चकले बन गये हैं ! हिन्दी की अनैतिक साहित्यिक सत्ता प्रकरण पर आने के पहले वे रामचन्द्र शुक्ल से लेकर सुधीश पचौरी जैसे "अकादमिक बौने छुटभैयों" का उल्लेख करना नहीं भूलते. खरे साहब इस बात के लिए याद किए जाने चाहिए कि उन्हें इस बात का अहसास है कि "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है." जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो के ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे.

मुझे लगता है कि विष्णु खरे की सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी यह है - " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."

यह कैसे क्षम्य है, इसका जवाब खरे से मांगा जाना चाहिए. यह टिप्पणी कैसे राज ठाकरे की टिप्पणी से गुणात्मक रूप से भिन्न है, और इस टिप्पणी के लिए क्यों विष्णु खरे को माफी नहीं मांगनी चाहिए?

हिन्दी का पूर्वांचल कहां है और कौन कौन से लोग खरे को दिखलाई पड रहे हैं जो हिन्दी के अन्य क्षेत्रों की तुलना में नैतिकता विहीन हैं.

एक बार अगर यह मान भी लिया जाए कि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि-पत्रकार विष्णु खरे ने अपनी बात दर्द से अपनों से तीखे ढंग से की है तो भी इन वक्तव्यों के पीछे छिपी कुठाएं हमें यह बतलाती हैं कि वे बौखलाए हुए दंभी दिल्ली के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिन्हें इस बात की खबर नहीं है कि ऐसे चालाक-चतुर सठिया गये होने का अंदाजा नहीं है.

हिन्दी विभाग और हिन्दी से जुडी संस्थाएं सबकुछ ठीक से कर रही हैं ऐसा मानने वाला कोई नहीं होगा लेकिन क्या हिंदी के जुडते ही कोई विभाग, कोई संस्थान, कोई राज्य या कोई बुद्धिजीवी घटिया और नैतिकताविहीन हो जाता है? मैकॉले और नीरद चौधरी की संतानें ऐसा कहें तो हम समझ सकते हैं लेकिन एक ऐसे व्यक्ति की कलम से इस तरह के भाव का आना हमें व्यथित करता है.

जनसत्ता में इस तरह के लेख का छपना बगैर प्रतिवाद के नहीं जाना चाहिए. विभूति नारायण राय के प्रसंग में जनसत्ता के साथ चलकर विष्णु खरे अपने अतिवादी अराजक सोच को भी उसके साथ नत्थी करने की जो कोशिश कर रहे हैं वह निंदनीय है. उन्हें माफी मांगनी चाहिए.

Sunday, 1 August, 2010

जगदीश्वर चतुर्वेदीद्वारा ‘डिजिटल’ मनमोहन सिंह का मूल्यांकन

मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 6 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। ऐसा क्यों हो रहा है कि आलोचना के केन्द्र से मनमोहन सिंह गायब हैं। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।

मनमोहन सिंह ने जब पहलीबार ‘यूपीए -1’ के प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला तो उस समय दो महत्वपूर्ण बातें घटित हुईं, पहली, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया और मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया।

दूसरी बड़ी घटना यह हुई कि मनमोहन सिंह सिख थे, नव्य-उदारतावादी नीतियों के निर्माता थे। इनमें उनका सिख होना बेहद महत्वपूर्ण माना गया। यह भी कहा गया कि कांग्रेस कितनी महान पार्टी है कि उसने एक औरत को पार्टी का अध्यक्ष बनाया और एक सिख को प्रधानमंत्री बनाया। ये दोनों ही बातें तथ्य के रूप में सही हैं लेकिन सिख और औरत के नाते सही नहीं हैं। सोनिया को औरत के नाते अध्यक्ष नहीं बनाया गया। मनमोहन सिंह सिख के नाते प्रधानमंत्री नहीं बने। इन दोनों का औरत और सिख वाला रूप सिर्फ प्रतीकात्मक है। असल तो राजनीति है और राजनीतिक इमेज है जिसने इन्हें अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनाया। राजनीति में एक ही अस्मिता होती है वह है राजनीतिज्ञ की। समस्त अस्मिताएं इसमें समा जाती हैं या फिर अप्रासंगिक हो जाती हैं।

मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है,शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों का उन्हें विश्व में बेहतरीन विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने अपनी नीतियों के कुफल और सुफल दोनों से प्रभावित किया है। मीडिया में मनमोहन सिंह के बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।



सवाल यह है कि डिजिटल युग में मनमोहन का कोड क्या है ? मनमोहन कोड को खोले बिना उनकी डिजिटल युग की छायाओं की सही भाषा को समझने में मदद नहीं मिलेगी। पहली समस्या है कि क्या मनमोहन कोड जैसी कोई चीज है ? हमारे देश में विद्वानों की कमी नहीं है जो इस तरह के किसी भी कोड की उपस्थिति को अस्वीकार करें।

भारत में सन् 1980 के दौर में पंजाब में जिस तरह का आतंकी दौर था और ब्लू स्टार ऑपरेशन हुआ,श्रीमती गांधी की एक सिख के हाथों हत्या हुई और बाद में संगठित सिख जनसंहार हुआ, उसे देखते हुए मनमोहन सिंह का क्रमशः सत्ता के शिखर पर पहुँचना निश्चित ही बड़ी बात है। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं से भी उनका सिख होना कारक या समस्या नहीं था।

भारत की बहुलतावादी संरचनाएं इतनी ताकतवर हैं कि उन्होंने जाति और धर्म के आधार को कमजोर कर दिया है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक संस्कृति का तानाबाना जिस तरह विकसित हुआ है उसने आधुनिक सोच और आधुनिक व्यवहार की मजबूत नींव रखी है। भारत में धार्मिक और साम्प्रदायिक पहचान का वर्चस्व खत्म हुआ है। अब मनमोहन सिंह के पास सिख के नाम पर दाढ़ी और पगड़ी ही चिह्न के रूप में बची है।

सवाल उठता है क्या मनमोहन सिंह को सिख अस्मिता के रूप में देखें ? या फिर उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके जीवनानुभवों की कहानियों, माइथोलॉजी,इमेज,संवेदना,वैज्ञानिक विमर्श आदि को भी देखें। क्या इतनी चीजों को मिलाकर देखने से मनमोहन सिंह का सिखभाव बचा रहेगा ?

क्या मनमोहन के दृश्य और अदृश्य जीवन की इमेजों के आधार पर उनके सिख को परिभाषित कर सकते हैं ?क्या उससे सिख निकलेगा ?मूल समस्या यह है कि क्या मनमोहन सिंह सिख हैं ? इसबार के लोकसभा चुनाव में पंजाब के सिखों ने कांग्रेस को ज्यादा संसदीय सीटें जीताकर दीं। क्या इस तरह की जीत को सिख मनमोहन के व्यक्तित्व से जोड़कर देख सकते हैं ?

कांग्रेस ने अपने प्रचार में सोनिया-मनमोहन और राहुल गांधी के त्रिगुट की इमेज का इस्तेमाल किया था। इस त्रिमूर्ति की विजुअल इमेज किसी भी तरह के नस्ल संबंधी संकेत का प्रचार नहीं करती। लेकिन इस त्रिमूर्ति की इमेज का डिजिटल रूपों में जिस तरह प्रचार किया गया उसमें एक नए किस्म का स्पेस -टाइम संबंध उभकर आया है। नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है।

मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात की है। बार-बार विकासदर को उछाला है। अपने को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।

मनमोहन सिंह भारत के अकेले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने कभी मजदूरों-किसानों को सम्बोधित नहीं किया है। मनमोहन की इमेज से मजदूरों-किसानों का दूर रहना जितना दृश्य है उससे भी ज्यादा दृश्यगत है उनका किसानों का ऋण माफ करना। यह ऐसा पैसा था जो डूब गया था,जिसकी वसूली संभव नहीं थी, अतः उसे माफ करके उन्होंने पूंजीवाद के हित में बड़ा कदम उठाया। इस फैसले से किसानों को कम और बैंकों को ज्यादा लाभ पहुँचा है।

मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बना दिया है। गरीबी और अभाव को एकसिरे से अपदस्थ कर दिया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित कर दिया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहन कोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। उनके लिए वे ठोस सामाजिक वर्ग भी समस्या नहीं रहे जिनके कारण गरीबी और अभाव कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।

मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।

माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।

कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।

मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की गयी। सामाजिक अस्थिरता पैदा की गयी। घृणा का वातावरण पैदा किया गया। ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।

Monday, 26 July, 2010

प्रख्यात पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक प्रोफेसर जीडी अग्रवाल जी का आमरण अनशन आज सातवें दिन भी जारी

मातृ सदन, हरिद्वार। 26 जुलाई 2010। प्रख्यात पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक प्रोफेसर जीडी अग्रवाल जी का आमरण अनशन आज सातवें दिन भी जारी है। प्रो. जीडी अग्रवाल जी का छोटा सा संकल्प है कि ‘गंगोत्री से लेकर धरासू तक 130 किलोमीटर गंगा की भागीरथी धारा को उसी रुप में रहने दो। ताकि आने वाला पीढ़ी इस गंगा को देख के समझे कि यही गंगा हमारे भारतवर्ष में बहती थी।‘ आज सरकार उसे भी नष्ट करने पर तुली है। इस संकल्प के साथ वे दो बार और अनशन कर चुके हैं।




स्वामी हंसदेवाचार्य ने कहा कि गंगा भारतीय संस्कृति का आधार और विश्व के आस्था का केन्द्र है। लोहारी नागपाला परियोजना जो की भागीरथी धारा पर बन रही है, को हम किसी कीमत पर बनने नहीं देंगे। संत समिति और गंगा महासभा सरकारों के इस प्रयास का पुरजोर विरोध करेंगे।



गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री आचार्य जितेन्द्र अनशन स्थल पहुंच कर अनशन को पूर्ण समर्थन देने कि घोषणा की है। मातृसदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद ने कहा कि केन्द्र सरकार ने परियोजना को हरी झंडी दिखाकर संत समाज के साथ धोखा किया है। लोहारी नागपाला गंगा और हिमालय को बहुत ज्यादा क्षति पहुंचायेगी।

प्रो. जी.डी अग्रवाल के अमरण अनशन के समर्थन में विभिन्न स्थानों पर लोगों ने 21 दिवसीय उपवास शुरू किए। साध्वी समर्पिता ने नानक पुरा सप्तऋषि ने अनशन जारी रखा है।



प्रो. अग्रवाल जी के इस उद्यात्त सत्याग्रह को समर्थन देने वालों का तांता लगा हुआ है। अग्रवाल जी के समर्थन में ग्राम अजीतुपर के डॉ. विजेन्द्र चौहान व श्री पूरणचन्द कश्यम एक दिवसीय उपवास में रहे। इसके अतिरिक्त आशीषगौड़, नीलिमास्वरुप मुजफ्फर नगर, दरभंगा बिहार से देवानन्द झा, मुम्बई से राजकुमार झा, खरीदाबाद से राखी, दिल्ली से साक्षी, देहरादून से नीतिन व सोनिया पाण्डे, इसके अतिरिक्त जिला बार काउन्सिल के अध्यक्ष एडवोकेट ललित उपाध्यक्ष, अरुण कुमार भदौरिया आदि ने अनशन अनशन स्थल पर आकर समर्थन किया।

Sunday, 25 April, 2010

हारिल उपन्यास पर मैत्रेय पुस्तकालय नैहाटी द्वारा एक विचार गोष्ठी का आयोजन

24 अप्रिल को शंभुनाथ, प्रफुल्ल कोलख्यान, श्यामल भट्टाचार्य, सेराज खान बातिश, शैलैन्द्र,  इन्दु सिंह, निशांत, संजय जायसवाल, आनंद, विमलेश त्रिपाठी आदि ने एक गंभीर पुस्तक चर्चा में भाग लिया.

Saturday, 17 April, 2010

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Tuesday, 6 April, 2010

प्यारे जोशी की कहानी रह जाएगी

नेत्र बल्ल्भ जोशी की तेरहवीं पर उनके चाहनेवाले कलकत्ता, जबलपुर और दिल्ली से चलकर कुकुछिना पहुंचे. कलकत्ता से विजय शर्मा और मैं 28 मार्च को चलकर 30 की शाम को वहाँ पहुंचे. लखनऊ में रवीन्द्र शुक्ला भी मिल गये. हमलोग साथ साथ कुकुछिना पहुंचे. वहाँ जोशी जी का शोक संतप्त परिवार तो था ही आस पास के कई लोग बैठे हुए थे. यह देख कर तसल्ली हुई कि परिवार दु:खी तो था लेकिन अपने को संयत कर सकने में सफल था. दो दिनों बाद दिल्ली से बाणी शरद, बीना जी एवं तोषाण भी आ गये. हम सब जोशी जी को याद करते रहे. एक दुश्चिंता यह घेरे थी कि हमलोग जिस जगह से इतना जुड चुके हैं उस जगह से जोशी जी के चले जाने के बाद किस तरह अपने को जोडे रख सकते हैं. लगता है एक अध्याय खत्म हो गया. हम सब जोशी जी की तेरहवीं (2 अप्रिल) को उनके शोक संतप्त परिवार और स्वजनों के साथ थे. 3 तारीख को मैं कलकत्ता के लिए रवाना हुआ. बाद में सभी विदा हुए. प्यारे जोशी जी की कहानी रह जाएगी.

Friday, 26 March, 2010

Netra Ballabh Joshi is no more

There are few people who are not considered 'great' and they are not revered and admired by thousands but, they continue to do things which presereve whatever greatness is in our culture. Netra Ballabh Joshi is one of those people who had made a remote village of Almora- Kukuchhina  a place where one can go and experience something which is divine. I am grateful to historian Lal bahadur Verma for suggesting to go to this place and meet two wonderful people- Netra ballabh Joshi and Ravindra Shukla. Joshi was a remarkable man- full of energy and love. I can say that he was a unique man who was a spiritual and worldly in a unique way.
I met him every year in May when I go there to spend two weeks. Here, in the hospitality of Joshiji, I wrote a book- Haaril which earned me a name among Hindi writers. I recollect how this book was written in two weeks. The concluding part was written and I sensed that this is it, and I found Joshiji standing on the door of his cottage with a glass of tea.
I deeply mourn the death of this man who single handedly changed the face of Kukuchhina with the help of a remarkable lady from France Catherine 'Parvati'.
They ran a lovely school for local children, organised annual cultural functions, ran various projects for the benefit of local people and did wonders by providing hospitality for any visitor to this area.
No words can describe sense of loss I, along with my friends and my family members, feel at this moment. He passed away on 22 March, 2010 at around 12.30 at the age fof 70 something.
The place will not be the same again.
Joshiji's tea shop, the last point where from one starts the tracking for Babaji's Ashram and Pandavkholi, would be there but the man seated there (in picture) would not be there.
He would be in our hearts. We can never forget this man as long as we are alive.  God bless his soul!
He was the man who was down to earth. He was equally comfortable with any body. He was a lover of scholarship, he was ready to listen to schoalrs' opinions but he was a firm believer that this ancient land and its wisdom is what would lead us through in life, and after...
(In this picture he is with Rupa Gupta in May, 2008 when we were staying in his Mrinal Kanta Bhattacharya Ashram, Kukuchhina)

Shyamal Bhattacharya received an award

Shyamal Bhattacharya is receiving Sutapa Roychowdhuri Memorial bangla akademi award 2010 from Dibyendu Palit on 25.03.2010 at Pashim Banga Bangla Academy katha sahitya utsab,Rabindra Sadan Complex,kolkata.

Great Netra Ballabh Joshi is no more

Saturday, 20 March, 2010

बिहार के पृथक राज्य बनने की कथा

बिहार की प्रशासनिक पहचान का विलोप 1765 में हो गया जब ईस्ट इंडिया कम्पनी को दीवानी मिली. उसके बाद यह महज एक भौगोलिक इकाई बन गया. अगले सौ सवा सौ सालों में बिहारी एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में तो रही लेकिन इसकी प्रांतीय या प्रशासनिक पहचान मिट सी गई. 1890 के दशक में ऐसा समय आया जब सच्चिदानंद सिन्हा जैसे बिहारी नौजवान के लिए यह दु:ख का विषय हो गया कि उसके बिहारी क्षेत्र की पहचान मिट चुकी थी और बिहार का पुलिस का नौजवान बिहार के स्टेशन में 'बंगाल पुलिस' का बैज लगाकर ड्यूटी देता था. सांस्कृतिक इतिहास का यह एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे औपनिवेशिक युग में एक प्राचीन काल से आ रही पहचान क्रमश: मिटने लगी क्योंकि इस पहचान को बनाए रखने के लिए प्रशासनिक प्रयत्न नहीं हुए. 1911 में बिहार और उडीसा के बंगाल से अलग होने के सौ बरस होने वाले हैं. आज भी इतिहास के इस मोड का बिहार की ओर से विवेचन का अभाव है. इस तरह के निर्णय लेने के पीछे का इतिहास बहुधा एक रेखीय नहीं होता. क्या कारण था कि बिहार को बंगाल से अलग लेने का निर्णय ब्रिटिश सरकार ने लिया इस प्रश्न का एक उत्तर यह दिया जाता है कि ब्रिटिश सरकार बंगाल के टुकडे करके उभरते हुए राष्ट्रवाद को कमजोर करना चाहती थी. पहले उसने बंग-विभाजन के द्वारा ऐसा करने की कोशिश की और फिर बाद में बंगाल से बिहार और उडीसा को अलग कर दिया. बंग विभाजन के विरोध का जो इतिहास उपलब्ध है उसमें बिहार में इसके प्रति उदासीनता को लक्षित किया जाना चाहिए. साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि बिहार का बंगाल से अलग किए जाने का कोई बडा विरोध बंगाल में नहीं हुआ. यह लगभग स्वाभाविक सा ही माना गया. बिहार को पृथक राज्य बनाने के लिए हुए आन्दोलन के पीछे सच्चिदानंद सिन्हा एवं महेश नाराय़ण समेत अन्य आधुनिक बुद्धिजीवियों के नेतृत्व को केन्द्र में रखकर चर्चा होती है जिन्होंने 1894 में बिहार टाइम्स नामक पत्र के माध्यम से बिहार के बुद्धिजीवियों के बीच इस संबंध में जागरूकता फैलाने का काम किया. इसमें संदेह नहीं कि इन लोगों ने इस विषय पर एक बौद्धिक आन्दोलन तेज किया और इस प्रक्रिया को स्वीकृत करने में सरकार के लिए सुविधाजनक स्थिति पैदा की, लेकिन यह आन्दोलन , कम से कम विचार के रूप में, 1870 के दशक से उपस्थित था. "बिहार बिहारियों के लिए" का विचार सर्वप्रथम मुंगेर के एक उर्दू अखबार मुर्घ -इ- सुलेमान ने पेश किया था.एक अन्य पत्र कासिद ने भी इसी तरह के वक्तव्य प्रकाशित किए. इसी दशक में बिहार के प्रथम हिन्दी पत्र- बिहार बन्धु (संपादक -केशवराम भट्ट ) ने भी इस तरह के विचार को आगे बढाया. तब से लेकर 1994 तक विविध रूपों में यह विचार व्यक्त होता रहा जिसका ही एक प्रतिफलन बिहार का बंगाली विरोधी आन्दोलन था जो बिहार के प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में बंगालियों के वर्चस्व के विरोध के रूप में उभरा. एल. एस. एस ओ मैली से लेकर वी सी पी चौधरी तक विद्वानों ने बिहार के बंगाल के अंग के रूप में रहने के कारण बढे पिछडेपन की चर्चा की है. इस चर्चा का एक सुंदर समाहार गिरीश मिश्र और व्रजकुमार पाण्डेय ने प्रस्तुत किया है. इन चर्चाओं में यह कहा गया है कि अंग्रेज़ बिहार के प्रति लापरवाह थे और लगातार बिहार उद्योग धंधे से लेकर शिक्षा, व्यवसाय और सामाजिक क्षेत्र में लगातार पिछडता रहा. चूँकि बिहार में बर्दमान के राजा या कासिमबाजार के जमींदार की तरह के बडे जमींदार नहीं थे यहाँ के एलिट भी उपेक्षित ही रहे. दरभंगा महाराज को छोडकर बिहार के किसी बडे जमींदार को अंग्रेज महत्त्व नहीं देते थे. जिस क्षेत्र में विदेशियों के साथ व्यापार का इतना महत्त्वपूर्ण सम्पर्क था उसका बंगाल के अंग के रूप में रहकर जो हाल हो गया था उससे यह निष्कर्ष निकालना स्वाभाविक था कि बिहार को बंगाल के भीतर रहकर प्रगति के लिए सोचना संभव नहीं.
बिहार बंगाल प्रेसिडेंसी से कैसे अलग राज्य बना, इस प्रश्न के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए 1870 के दशक में जाना आवश्यक है. यही वह समय था जब पहली बार बिहार के पढे-लिखे लोगों के बीच यह भावना आयी कि स्कूल से लेकर अदालत और किसी भी सरकारी दफ्तरों की नौकरियों में बंगालियों का वर्चस्व अनैतिक है. बिहार के प्रथम समाचार पत्र बिहार बन्धु में इस आशय के पत्र और लेख प्रकाशित हुए जिसमें यहाँ तक कहा गया कि बंगाली ठीक उसी तरह बिहारियों की नौकरियाँ खा रहे हैं जैसे कीडे खेत में घुसकर फसल नष्ट करते हैं! सरकारी मत भी यही था कि बंगाली बिहारियों की नौकरियों पर बेहतर अंग्रेज़ी ज्ञान के कारण कब्ज़ा जमाए हुए हैं. 1872 में , बिहार के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉर्जे कैम्पबेल ने लिखा था कि चूंकि बिहार का शासन बंगाल से बंगाली अधिकारियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, इसलिए हर मामले में अंग्रेजी में पारंगत बंगालियों की तुलना में बिहारियों के लिए असुविधाजनक स्थिति बनी रहती है. सरकारी द्स्तावेज़ों और अंग्रेज़ों द्वारा लिखित समाचार पत्रों के लेखों में भी यही भाव ध्वनित होता है. यह बात खास तौर पर कही जाती थी कि शिक्षित बंगाली रेल की पटरियों के साथ साथ पंजाब तक नौकरियाँ पाते गये. खासतौर से कलकत्ता से इसी दशक में प्रकाशित सम्पादकीय इस मामले में द्रष्टव्य है. इसमें जो कुछ कहा गया है वह आँकडों के आधार पर कहा गया है. इस पत्र ने लिखा कि बिहार के लगभग सभी सरकारी नौकरियाँ बंगाली के हाथों में है. बडी नौकरियाँ तो हैं ही छोटी नौकरियों पर भी बंगाली ही हैं. जिलेवार विश्लेषण करके पत्र ने लिखा कि भागलपुर, दरभंगा, गया, मुजफ्फरपुर, सारन, शाहाबाद और चम्पारन जिलों के कुल 25 डिप्टी मजिस्ट्रेटों और कलक्टरों में से 20 बंगाली हैं. कमिश्नर के दो सहायक भी बंगाली हैं. पटना के 7 मुंसिफों ( भारतीय जजों) में से 6 बंगाली हैं. यही स्थिति सारन की है जहां 3 में से 2 बंगाली हैं. छोटे सरकारी नौकरियों में भी यही स्थिति है. मजिस्ट्रेट , कलक्टर, न्यायिक दफ्तरों में 90 प्रतिशत क्लर्क बंगाली हैं. यह स्थिति सिर्फ जिले के मुख्यालय में ही नहीं थी, सब-डिवीजन स्तर पर भी यही स्थिति है. म्यूनिसिपैलिटी और ट्रेजेरी दफ्तरों में बंगाली छाए हुए हैं.
इस प्रकार के आँकडे देने के बाद पत्र ने अन्य प्रकार की नौकरियों का हवाला दिया है. पत्र के अनुसार दस में से नौ डॉक्टर और सहायक सर्जन बंगाली हैं. पटना में आठ गज़ेटेड मेडिकल अफसर बंगाली हैं. सभी भारतीय इंजीनियर के रूप में कार्यरत बंगाली थे. एकाउंटेंट, ओवरसियर एवं क्लर्कों में से 75 प्रतिशत बंगाली ही थे. संपादकीय का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह है जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि जिस दफ्तर में बिहारी शिक्षित व्यक्ति कार्यरत है उसको पग पग पर बंगाली क्लर्कों से जूझना पडता था और उनकी मामूली भूलों को भी सीनियर अधिकारियों के पास शिकायत के रूप में दर्ज कर दिया जाता था. सम्पादकीय का निष्कर्ष है कि बिहार की नौकरियों को बंगाली आकांक्षाओं की सेवा में लगा दिया गया है.
बंगालियों के बिहार में आने के पहले नौकरियों में कुलीन मुसलमानों और कायस्थों का कब्ज़ा था. स्वाभाविक था कि बंगालियों के खिलाफ सबसे मुखर मुसलमान और कायस्थ ही थे. यहीं से 'बिहार बिहारियों के लिए' का नारा उठा. पहले कुलीन मुसलमानों ने इसे मुद्दा बनाया और बाद में कायस्थों ने.
अंग्रेज़ी शिक्षा के क्षेत्र में बिहार ने बहुत कम तरक्की की थी. सबकुछ कलकत्ता से ही तय होता था इसलिए बिहार में कॉलेज भी कम ही खोले गये. यह बहुत प्रचारित नहीं है कि जब कॉलेज खोलने का निर्णय किया गया तो ब्रिटिश कम्पनी सरकार ने तय किया था कि बंगाल प्रेसिडेंसी में दो कॉलेज खोले जाएं- एक अंग्रेजी शिक्षा के लिए कलकत्ता में और एक संस्कृत शिक्षा के लिए तिरहुत अंचल में (क्योंकि पारम्परिक संस्कृत शिक्षा केन्द्र के रूप में तिरहुत प्रसिद्ध था). यह बंगाल के प्रसिद्ध भारतियों को पसंद नहीं आया और प्रयत्न करके संस्कृत कॉलेज भी कलकत्ता में ही खोला गया. बिहार में बडे कॉलेज के रूप में पटना कॉलेज था जिसकी स्थापना 1862-63 में की गयी थी. इस कॉलेज में बंगाली वर्चस्व इतना अधिक था कि 1872 में जॉर्ज कैम्पबेल ने यह निर्णय लिया कि इसे बंद कर दिया जाए . वे इस बात से क्षुब्ध थे कि 16 मार्च 1872 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उपस्थित 'बिहार' के सभी छात्र बंगाली थे! यह सरकारी रिपोर्ट में उद्धृत किया गया है कि "हम बिहार में कॉलेज सिर्फ प्रवासी बंगाली की शिक्षा के लिए खुला नहीं रखना चाहते". इस निर्णय का विरोध बिहार के बडे लोगों ने किया. इन लोगों का कथन था कि इस कॉलेज को बन्द न किया जाए क्योंकि बिहार में यह एकमात्र शिक्षा केन्द्र था जहाँ बिहार के छात्र डिग्री की पढाई कर सकते थे. इन लोगों ने बिहारियों के शैक्षणिक उत्थान के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा मिले तो यहाँ के लोग भी आगे बढ सकते हैं.
बिहार की सरकारी नौकरियों में बंगाली वर्चस्व पर कई सरकारी रिपोर्टों में उल्लेख मिलता है. अंतत: सरकारी आदेश दिए गए कि जहाँ रिक्त स्थान हैं उनमें उन बिहारियों को ही नौकरी पर रखा जाए जिन्हें शिक्षा का सुयोग मिला है. आदेश में कई जगहों पर यह स्पष्ट कहा जाता था कि इसे बंगालियों को नहीं दिया जाए. इसी तरह के कुछ आदेश उत्तर पश्चिम प्रांत में भी दिए गये थे. इस तरह के सरकारी विज्ञापन भी समाचार पत्रों में छपा करते थे जिसमें स्पष्ट लिखा होता था- "बंगाली बाबुओं को आवेदन न करें". बिहार में भी 1870 और 1880 के दशक में कई सरकारी आदेश दिए गये थे जिसमें यह कहा गया था कि बिहारियों को ही इन नौकरियों में नियुक्त किया जाए.
बिहार के कई समाचार पत्रों में इस आशय के कई लेख और पत्र प्रकाशित होते रहे जिसमें यह कहा जाता था कि बिहार की प्रगति में बडी बाधा बंगालियों का वर्चस्व है. नौकरियों में तो बंगाली अपने अंग्रेज़ी ज्ञान के कारण बाजी मार ही लेते थे बहुत सारी जमींदारियां भी बंगालियों के हाथों में थी.
इसमें संदेह नहीं कि बंगालियों के प्रति सरकारी विद्वेष के पीछे सिर्फ स्थानीय लोगों के प्रति उनका लगाव नहीं था. विभिन्न कारणों से बंगाल में चल रही गतिविधियों से जुडने के कारण बिहार में भी बंगाली समाज सामाजिक और राजनैतिक रूप से सजग था. उनके प्रभाव से शांत समझा जाने वाला प्रदेश बिहार भी अंग्रेज़ विरोधी राष्ट्रवादी आन्दोलन से जुडने लगा था. कई इतिहासकारों का मत है कि बंगालियों के प्रति बिहारियों के मन में विद्वेष को बढाने में सरकार की एक चाल थी. वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रीय और क्रांतिकारी विचारों का जोर बिहार में बढे.
इसमें संदेह नहीं कि बिहार में बंगाली नवजागरण का प्रभाव पडा था और बिहार के बंगाली राजनैतिक और बौद्धिक क्षेत्र में आगे बढे हुए थे. शैक्षणिक, स्वास्थ्य, सार्वजनिक संगठन तथा समाज सुधार के क्षेत्र में बंगाली समाज बिहार में बहुत सक्रिय था. यह नहीं भूला जा सकता कि भूदेव मुखर्जी जैसे बंगाली बुद्धिजीवी-अधिकारी के कारण ही हिन्दी को बिहार में प्रशासन और शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकृति मिल सकी. बिहार में प्रेस के क्षेत्र में क्रांतिकारी भूमिका प्रदान करने वाले दो महापुरूषों- केशवराम भट्ट और रामदीन सिंह के साथ बंग-संसर्ग के कैसे अलग किया जा सकता है?
इन सबके बावजूद यह मानना ही पडेगा कि बिहार के बहुत सारे शिक्षित लोगों को यह लगता था कि बंगाल के साथ होने के कारण और प्रशासन का कलकत्ता से नियंत्रण होने के कारण बिहारियों के प्रति सरकार पूरी तरह से न्याय नहीं कर पाती.
बंगाल से बिहार के अलग होने की प्रशासनिक भूमिका के दशकों पहले से बिहार के शिक्षितों के बीच बंगाली वर्चस्व के विरूद्ध भाव सक्रिय थे. इस भाव का एक प्रकाश हम अल- पंच में 1889 में प्रकाशित नज़्म में पाते हैं जिसका शीर्षक था- 'सावधान ! ये बंगाली है". इस भाव की ही एक और प्रस्तुति 1880 में 'बिहार के एक शुभ-चिंतक' का पत्र है जिसमें बंगालियों की तुलना दीमकों से की गई है जो बिहार की फसल (नौकरियों) को 'खा रहे हैं'. बुद्धिजीवियों के बीच बंगाली वर्चस्व के प्रति इस भाव के कारण ही इस बात के लिए समर्थन पैदा होने लगा कि बंगाल के साथ रहकर बिहारियों की स्वार्थ -रक्षा संभव नहीं.
1890 के दशक में बिहार की पत्र पत्रिकाओं में (खासकर बिहार टाइम्स में ) इस आशय के लेख नियमित रूप से छपने लगे जिसमें बिहार की दयनीय स्थिति के प्रति सचेतनता और परिस्थिति के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया था. बिहार टाइम्स ने लिखा कि बिहार की आबादी 2 करोड 90 लाख है और जो पूरे बंगाल का एक तिहाई राजस्व देते हैं उसके प्रति यह व्यवहार अनुचित है. इस पत्र ने विभिन्न क्षेत्रों में बिहारियों के प्रतिनिधित्व को लेकर जो तथ्य सामने रखे उसे ध्यान में रखने पर बंगाल में बिहार की उपेक्षा की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता. कुछ प्रमुख बातें है- बंगाल प्रांतीय शिक्षा सेवा में 103 अधिकारियों में से बिहारी सिर्फ 3 थे, मेडिकल एवं इंजीनियरिंग शिक्षा की छात्रवृत्ति सिर्फ बंगाली ही पाते थे, कॉलेज शिक्षा के लिए आवंटित 3.9 लाख में से 33 हजार रू ही बिहार के हिस्से आता था, बंगाल प्रांत के 39 कॉलेज (जिनमें 11 सरकारी कॉलेज थे) में बिहार में सिर्फ 1 था, कलकारखाने के नाम पर जमालपुर रेलवे वर्कशॉप था (जहाँ नौकरियों में बंगालियों का वर्चस्व था) , 1906 तक बिहार में एक भी इंजीनियर नहीं था और मेडिकल डॉक्टरों की संख्या 5 थी.
ऐसे हालात में बिहारी प्रबुद्धों द्वारा बिहार को पृथक राज्य बनाए जाने का समर्थन दिया जाने लगा और स्वदेशी आन्दोलन के उपरांत हालात ऐसे हो गये कि कांग्रेस ने 1908 के अपने प्रांतीय अधिवेशन में बिहार को अलग प्रांत बनाए जाने का समर्थन किया गया. कुछ प्रमुख मुस्लिम नेतागण भी सामने आये जिन्होंने हिन्दू मुसलमान के मुद्दे को पृथक राज्य बनने में बाधा नहीं बनने दिया. इन दोनों बातों से अंग्रेज शासन के लिए बिहार को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने का मार्ग सुगम हो गया. अंतत: वह घडी आयी और 12 दिसंबर 1911 को बिहार को अलग राज्य का दर्जा मिल गया. बिहार की पहचान उसे 145 बर्ष बाद उसे प्राप्त हुई.
यह एक नयी शुरूआत थी. [ इस लेख के संपादित अंश दैनिक जागरण, 18 मार्च, पटना , में प्रकाशित ]